BHU: राखीगढ़ी मैन ने कहा- 4500 साल पहले हड़प्पा काल से मिल रहे संस्कृत के साक्ष्य, दी खास जानकारी
पुरातत्वविद् प्रोफेसर वसंत शिंदे भाषाओं को लेकर खास जानकारियां साझा की। उन्होंने बताया कि इनका मूल एक ही है। उन्होंने भारत में डीएनए फिंगरप्रिंट के जनक वैज्ञानिक डॉ. लालजी सिंह का उदाहरण दिया।
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Varanasi News: संस्कृत के तार हड़प्पा सभ्यता से जुड़ने के साक्ष्य मिल रहे हैं। करीब 4500 साल पहले हड़प्पा सभ्यता ही ऋग्वैदिक कालीन हो सकता है। संस्कृत को 2500 साल पुरानी भाषा समझना भूल है। हमें कई साइट पर संस्कृत की प्राचीनता को लेकर पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं। ये बातें बीएचयू में सोमवार को पुरातत्वविद् और ‘राखीगढ़ी मैन’ के नाम से प्रसिद्ध प्रोफेसर वसंत शिंदे ने कहीं।
उन्होंने हिंदी प्रकाशन की ओर से बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग में आयोजित हिंदी सप्ताह ‘अन्विति’ का उद्घाटन किया। प्रो. शिंदे ने बताया कि भारत में चार प्रमुख भाषा परिवार हैं। इंडो-यूरोपियन, द्रविड़, ऑस्ट्रो-एशियाटिक और तिब्बतो-बर्मन। लेकिन, डीएनए विश्लेषण से यह सिद्ध होता है कि हम सभी भारतीय एक ही साझा मूल से जुड़े हैं। प्रो. शिंदे ने हिंदी को इंडो-यूरोपियन भाषा परिवार का हिस्सा बताया।
कई विषयों की पढ़ाई से आएगी वैज्ञानिकता
उन्होंने कहा कि इन दिनों विद्यार्थियों को बहु-विषयक (मल्टी डिसिप्लिनरी) दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इससे भारत के प्राचीन इतिहास और सभ्यता को वैज्ञानिक और वृहद स्तर पर समझा जा सकेगा। उन्होंने भारत में डीएनए फिंगरप्रिंट के जनक वैज्ञानिक डॉ. लालजी सिंह का उदाहरण दिया।
बताया कि डॉ. लालजी सिंह की प्रारंभिक शिक्षा हिंदी माध्यम में हुई थी, फिर भी उन्हें अपना शोध अंग्रेजी में प्रस्तुत करने में कोई कठिनाई नहीं महसूस हुई। प्रो. शिंदे ने कहा कि मातृभाषा को बढ़ावा देना देश के पूर्ण विकास के लिए जरूरी है। अपनी भाषा और संस्कृति को अपनाने से ही हम अपनी पहचान को और मजबूत कर सकते हैं।
भाषा कहती है मन की बात, फिर कैसा विवाद
प्रो. शिंदे के संबोधन के बाद छात्र और छात्राओं ने कविताओं का पाठ किया। मन कहता है, ममता के आंचल में भर लूं उसे..., भाषा तो कहती है मन की बात, फिर कैसा वाद-विवाद..., हिंदी बहन, तू टेंशन न ले..., आखिर बताइए, हिंदी बोलने में शर्म क्यों आती है... आदि कविताओं को सुन लोगों ने खूब तालियां बजाईं।
इन्होंने किया मूल्यांकन : काव्य पाठ का मूल्यांकन डॉ. भूपेंद्र कुमार और डॉ. विवेक लाहा ने किया। इस दौरान अध्यक्ष प्रो. एम. सिंगरवेल, हिंदी प्रकाशन समिति के समन्वयक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे, डॉ. चंद्रशेखर पति त्रिपाठी, डॉ. सचिन आदि मौजूद रहे।