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Ustad Bismillah Khan: मुहर्रम पर उस्ताद के घर पर सजी 76 साल पुरानी मजलिस, नौहे सुन छलकीं आंखें; नौहाख्वानी

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Fri, 19 Jun 2026 05:51 AM IST
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सार

Varanasi News: वाराणसी में मुहर्रम के अवसर पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के आवास पर 76 वर्ष पुरानी परंपरागत मजलिस आयोजित हुई। उलेमाओं ने इमाम हुसैन की शहादत पर प्रकाश डाला, जबकि अंजुमनों ने नौहाख्वानी और मातम के जरिए खिराजे अकीदत पेश की। ख्वातीन की मजलिस में उस्ताद की बेटी और पोती ने नौहे पढ़कर श्रद्धालुओं को भावुक कर दिया।

Ustad Bismillah Khan Majlis tradition observed occasion of Muharram eyes welled up while listening to Nauhas
नौहे सुन छलकीं आंखें। - फोटो : संवाद
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विस्तार

Varanasi News: शहनाई के जादूगर भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की करीब 76 साल पुरानी रवायती मजलिस बृहस्पतिवार को हुई। दूसरी मुहर्रम को हड़हासराय स्थित उनके दौलतखाने पर नौहाख्वानी और मातम के जरिये इमाम हुसैन की शहादत को याद किया गया। उलेमा ने शहीदाने कर्बला का जिक्र किया। वहीं, नौहाख्वानों ने अपने कलाम से जब कर्बला का मंजर पेश किया तो सभी की आंखें नम हो गईं।



उस्ताद के घर पर बृहस्पतिवार को मर्द और ख्वातीन की मजलिस सिलसिलेवार हुईं। पहली मजलिस का आगाज सैयद अब्बास मुर्तुजा शम्सी की मर्सियाख्वानी से हुआ। मजलिस को खिताब करते हुए उलेमा ने कहा कि मुहर्रम की दूसरी तारीख को इमाम हुसैन अपने साथियों के साथ कर्बला के मैदान में पहुंचे थे। 
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नदी किनारे उन्होंने खेमा लगवाना शुरू किया लेकिन यजीदियों ने उसे उखाड़कर फेंक दिया। 10वीं मुहर्रम को यजीदियों ने इमाम हुसैन और उनके साथियों को शहीद कर दिया। 

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मजलिस में नौहाख्वानों ने जब कभी गैरत-ए-इंसा का सवाल आता है, बिन्ते जेहरा तेरे पर्दे का ख्याल आता है... सुनाया तो अजादारों की आंखें नम हो गईं। अंजुमन हैदरी ने नौहाख्वानी और मातम किया। मजलिस में अंसार हुसैन, बाकर हुसैन, कालिम हुसैन, नासिर अब्बास, गाजी अब्बास, हादी हसन, बंदे अली आदि रहे।

इसके बाद ख्वातीन की मजलिस शुरू हुई। अफ्शां फातमा ने कर्बला की जंग का मंजर पेश किया। उस्ताद की बेटी जरीना फातमा और पोती कहकशां ने नौहेख्वानी पेश की। उन्होंने सुनाया, कयामे गम अगर माहे अजा दे, गमे शब्बीर में आंसू बहा दे...।

लखनऊ से आते थे अब्बा के दोस्त
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की बेटी जरीना फातमा ने बताया कि इस मजलिस में लखनऊ से अब्बा के दोस्त भी शामिल होते थे। यहीं, हफ्ते भर तक रहते थे। हर रोज मजलिस में शिरकत करते और इमाम हुसैन की शहादत को याद करते थे। अब्बा पहले मीरनादे अली मस्जिद में मजलिस और रमजान की हर रवायत को निभाते थे। लेकिन, हम हमारा घर बन गया तब घर पर ही मर्दों और ख्वातीन की मजलिस होने लगी।

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