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ज्ञानवापी: मुगल बादशाहों के पास सिर्फ जजिया का अधिकार, संपत्ति पर नहीं करते थे कब्जा; वादमित्र ने दी दलील

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Fri, 29 Aug 2025 05:45 AM IST
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सार

Varanasi News: मुख्तार अंसारी को पक्षकार बनने को लेकर अपर जिला जज की की अदालत में सुनवाई हुई। इसमें दलील दी गई कि औरंगजेब उस संपत्ति का मालिक नहीं था। अब एक सितंबर को सुनवाई होगी।

Vaadmitra argued in Gyanvapi case Mughal emperors only had right to Jaziya did not capture property
Varanasi court - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

ज्ञानवापी प्रकरण में अपर जिला जज (14वें) सुधाकर राय की कोर्ट में गुरुवार को मुख्तार अंसारी को पक्षकार बनाने के लिए निगरानी अर्जी पर सुनवाई हुई। कोर्ट में वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी की ओर से बहस पूरी कर ली गई। अब अगली सुनवाई एक सितंबर को होगी। वाद मित्र ने कोर्ट में दलील दी कि पक्षकार बनाने का कोई औचित्य नहीं है।

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उन्होंने दलील दी कि विवादित जायदाद वक्फ की संपत्ति कभी नहीं रही है। न ही औरंगजेब उस संपत्ति का मालिक था। क्योंकि मुगल काल में जब कोई बादशाह राज्य पर कब्जा करता था तो वह सभी भूमि का मालिक नहीं होता था। उसे सिर्फ लगान लेने का अधिकार था। जिसे जजिया कर कहते थे। जबकि मुसलमान पर जो भी कर लगता था उसे ओसर कहते थे। 
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बादशाह का भूमि का फसल में एक तिहाई हिस्सा होता था। उस भूमि का मालिक सिर्फ जोतने वाला होता था। इसलिए औरंगजेब, अकबर आदि बादशाह जमीन मालिकों से भूमि को खरीद कर अपने किले बनाए। अगर वह जमीन का मालिक होता तो बादशाह को खरीदने की जरूरत नहीं होती। 

उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 1982 में एक विधि व्यवस्था में वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर को वक्फ संपत्ति को अवैध माना था। इसलिए इस मामले में पक्षकार बनाने का कोई औचित्य नहीं है। निगरानी कर्ता की अर्जी खारिज करने की गुहार लगाई गई। इस मामले में दोनों पक्षों में कई बार बहस हो गई है।

निगरानीकर्ता ने 32 साल बाद पक्षकार बनने की अर्जी दी
इससे पहले अपर जिला जज चौदहवां सुधाकर राय की अदालत में ज्ञानवापी प्रकरण में मुख्तार अंसारी की पक्षकार बनाने के लिए निगरानी अर्जी पर सुनवाई हुई थी। कोर्ट में वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी की ओर से बहस की गई। निगरानी कर्ता की अर्जी के विरोध में वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी ने कहा कि ये जनप्रतिनिधि वाद है। यह वर्ष 1991 में दाखिल किया गया था उस समय इस वाद में पक्षकार बनने संबंधित नोटिस के साथ गजट और सारी प्रक्रिया पूरी की गई थी। 

हुई बहस

निगरानीकर्ता ने 32 साल बाद पक्षकार बनने की अर्जी दी। मगर अर्जी में नोटिस के प्रक्रिया के कारणों के पूरी होने बाद पक्षकार बनने का योग्य तथ्य नहीं दर्शाया गया। इसमें मुस्लिम पक्ष के ओर से सक्षम और हित के संरक्षित के लिए अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी और सुन्नी वक्फ बोर्ड पक्षकार है। इसलिए निगरानी कर्ता की अर्जी पोषणीय नहीं है। कोर्ट से खारिज करने की गुहार लगाई है।

पिछली तारीख पर मुख्तार की ओर से बहस की गई थी कि अंजुमन इंतजामिया मसाजिद को मुस्लिम के तरफ से पक्षकार बनाया गया उसपर सिर्फ मस्जिद की देखरेख के करने की जिम्मेदारी है। वो मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व नहीं करते है। इसमें मुस्लिम पक्ष के संपूर्ण पक्ष रखने का अधिकार निगरानीकर्ता का है। इस मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड भी कई साल बाद पक्षकार बना तो उसे क्यों उसे पक्षकार बनने नहीं दिया जा रहा।

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