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मेरा गांव मेरी शान: सरहद पर सीना ताने खड़े चांग के बेटे, छोरे और छोरियों ने खेलों में भी गाड़ा लठ
भिवानी शहर से मात्र 15 किलोमीटर दूर लगभग 26,000 की आबादी वाला महाग्राम चांग आपसी भाईचारे, देश सेवा, स्वतंत्रता सेनानियों और खेल प्रतिभाओं के लिए अपनी अलग पहचान रखता है। यहां के रणबांकुरों ने जहां स्वतंत्रता आंदोलन में बहादुरी दिखाई, वहीं खेलों के मैदान में भी विरोधियों को पराजित कर गांव का नाम रोशन किया।
गांव में अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी योगिता परमार और राष्ट्रीय खिलाड़ी सपना टांक जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी मौजूद हैं। देश की आजादी से पहले नेताजी सुभाषचंद्र बोस के साथ आजाद हिंद फौज में कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता सेनानी रतिराम टांक की बहादुरी के किस्से आज भी गांव में प्रसिद्ध हैं। रतिराम टांक ने आजादी की लड़ाई में साहसिक योगदान दिया और गांव का नाम इतिहास में दर्ज कराया।
गांव की अधिकांश आबादी खेतीबाड़ी पर निर्भर है जबकि यहां व्यापारी वर्ग भी मौजूद है। इसके अलावा गांव के कई युवा सरकारी नौकरियों में भी कार्यरत हैं। गांव के अधिकांश युवा शिक्षित हैं। महिला सरपंच सुदेश रानी और उनके पति प्रदीप रंगा पढ़ी-लिखी पंचायत के रूप में गांव की बागडोर संभाल रहे हैं। वहीं उनके ससुर बृजलाल रंगा उर्फ बिरजू भी पंचायती कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसके साथ ही गांव चांग के महेंद्र सिंह ने सेना में वीरता पुरस्कार प्राप्त कर गांव का नाम देशभर में रोशन किया है।
मेरे छोटे भाई महेन्द्र सिंह ने सेना में रहते हुए वीरता पुरस्कार हासिल करके गांव चांग का नाम पूरे देश में रोशन किया है। पूरे परिवार के साथ गांव को उन पर गर्व है। फिलहाल वे मानेसर में ट्रेनिंग हवलदार के पद पर कार्य करते हुए सैनिकों को देश सेवा के जज्बे से परिपूर्ण कर रहे हैं। -सुभाष, चांग का ग्रामीण
मेरे दादा रतिराम टांक ने देश की आजादी से पहले नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में सिपाही के तौर पर बहादुरी से अंग्रेजों से देश मुक्त कराने का जज्बा दिखाया। मेरे दादा नौ साल तक जेल में भी रहे। आजाद हिंद फौज में लड़ाई के दौरान मेरे दादा ने दुश्मनों की सेना के कई सैनिकों को मार गिराया था। तत्कालीन समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों मेरे दादा को ताम्र पत्र भी मिले हुए हैं। हमें उन पर हमेशा गर्व रहेगा। -अमन टांक, स्वतंत्रता सेनानी रतिराम के पोत्र
मेरी बेटी योगिता परमार अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी है। बेटी योगिता ने बचपन से ही बच्चों के साथ खेलते-खेलते ओलंपिक में जाने की ठान ली थी और योगिता ने कड़ी मेहनत करते हुए अब तक 50 स्टेट गोल्ड मेडल और 17 नेशनल मेडल जीते हैं। बेटी ने दो अंतरराष्ट्रीय मेडल भी अपने नाम किए हैं। खेल की बदौलत ही आज बेटी योगिता रेलवे में सेवाएं दे रही है। बेटी योगिता शॉटपुट खेल में भारत की नंबर वन खिलाड़ी है। -अशोक परमार, योगिता के पिता
मैंने साल 2014 में कक्षा दसवीं में पढ़ते हुए स्कूली स्तर पर ताइक्वांडो खेलना शुरू किया था। उसके बाद अपने पिता के सहयोग से स्कूल स्टेट खेल में मेडल हासिल किया। कड़ी मेहनत करते हुए 2015 में नेशनल में गोल्ड मेडल हासिल किया। मैं आज तक स्टेट व नेशनल स्तर पर 10 बार मेडल जीत चुकी हूं। -सपना टांक, महिला खिलाड़ी
गांव चांग आपसी भाईचारे में बेमिसाल होने के साथ-साथ देश सेवा और खेलों के प्रति भी खूब जज्बा रखता है। यहां की बेटियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गांव को खेल क्षेत्र में पहचान दिलाई है। गांव के स्वतंत्रता सेनानी और सूरवीर सैनिकों की बदौलत देश की सरहद भी सुरक्षित है। गांव में हर तबका मेहनती है। यही वजह है कि गांव में हर कोई खुशहाल जिंदगी जी रहा है। -अमरपाल फौजी ग्रामीण
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