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मेरा गांव मेरी शान: 1930 में बने दुजाना के राजकीय मिडिल विद्यालय ने जगाई थी गांव में शिक्षा की अलख
क्षेत्र का ऐतिहासिक गांव दुजाना शिक्षा के क्षेत्र में दशकों से अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। आज भले ही गांव-गांव में स्कूल, कॉलेज खुल चुके हो।
एक समय ऐसा भी था, जब आसपास के क्षेत्रों में शिक्षा के संसाधन बेहद सीमित थे। उस दौर में नवाबों के गांव दुजाना में नवाब में 1929 में स्कूल की नींव रखी थी और 1930 में स्कूल का शुभारंभ हुआ था। गांव दुजाना का राजकीय मिडिल स्कूल पूरे क्षेत्र के लिए शिक्षा का बड़ा केंद्र बनकर उभरा था। ग्रामीण बताते हैं कि उस समय गांव दुजाना के आसपास कोई विद्यालय नहीं था। ऐसे में दुजाना विद्यालय की स्थापना होना बड़ी उपलब्धि मानी गई थी। यहीं कारण था कि गांव दुजाना के नजदीकी गांव धौड़, महराना, बिरधाना, गोच्छी, शेरिया, डीघल, मदाना खुर्द, मदाना कलां, चमनपुरा सहित आसपास के गांवों के छात्र पढ़ने के लिए आते थे। कई छात्र रोजाना कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचते थे।
ग्रामीणों के अनुसार उस दौर में शिक्षा हासिल करना आसान नहीं था। न पर्याप्त साधन थे और न ही परिवहन की सुविधा। इसके बावजूद विद्यार्थियों में पढ़ने का उत्साह और परिवारों में शिक्षा के प्रति जागरूकता देखने को मिलती थी। स्कूल में संसाधन सीमित थे, लेकिन शिक्षक पूरी लगन और अनुशासन के साथ विद्यार्थियों को पढ़ाते थे। यहीं वजह रही कि इस विद्यालय ने क्षेत्र में शिक्षा की मजबूत नींव रखी। ग्रामीणों का मानना है कि इस विद्यालय ने केवल दुजाना गांव ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की पीढि़यों को शिक्षित करने का कार्य किया।
स्कूल में पढ़कर बड़े पदों पर सेवाएं दी
गांव दुजाना निवासी नंबरदार मनीष बताते हैं कि गांव दुजाना में नवाब के समय में बने स्कूल में ग्रामीण पढ़कर बड़े पदों पर सेवाएं दी। कृष्ण शर्मा रोजगार कार्यालय में ऑफिसर, राजीव अहलावत एसडीएम, प्रधानाचार्य मुकेश, मनोज अहलावत, रामस्वरूप विद्यार्थी करोल बाग से सांसद बने थे।
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