चंदन का भारतीय संस्कृति से सदियों पुराना संबंध रहा है। इसका उपयोग पूजन, तिलक और धार्मिक अनुष्ठानों में प्रमुख रूप से किया जाता है। सफेद चंदन की लकड़ी से मूर्तियां, सजावटी वस्तुएं, हवन सामग्री और अगरबत्ती बनाई जाती हैं। इसके अलावा परफ्यूम उद्योग और अरोमा थेरेपी में भी चंदन की भारी मांग है। आयुर्वेद में चंदन से कई औषधियां तैयार की जाती हैं। गांव सांभली स्थित आनंद फार्म के संचालक स्वामी विमल कीर्ति के अनुसार, पहले चंदन प्राकृतिक रूप से दक्षिण भारत के जंगलों में पाया जाता था, लेकिन अब गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसान इसे खेतों में उगा रहे हैं। धीरे-धीरे हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के किसान भी चंदन की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2022 में राजस्थान से लगभग एक एकड़ क्षेत्र के लिए चंदन के पौधे लाए गए थे, जो अब 10 से 12 फीट तक बढ़ चुके हैं। सफेद चंदन के पौधों को जीवित रहने के लिए पास में किसी अन्य सहायक पौधे की आवश्यकता होती है, जिससे उनका पोषण बेहतर होता है।स्वामी विमल कीर्ति के अनुसार चंदन का पेड़ पूरी तरह तैयार होने में करीब 12 से 15 वर्ष का समय लेता है। पेड़ जितना पुराना होता है, उसकी कीमत उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है। 15 वर्ष बाद एक चंदन के पेड़ की कीमत 70 हजार से लेकर 2 लाख रुपये तक हो सकती है। यह खेती बेहद लाभकारी मानी जा रही है। यदि कोई किसान 50 पेड़ भी लगाता है, तो 15 वर्षों में उनकी अनुमानित कीमत करीब एक करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।