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Renouncing worldly attachments in Narnaul, Palak Jain will now lead a *sattvic* life; she is set to take *Diksha* in Delhi on April 23.
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नारनौल में सांसारिक मोह त्याग अब सात्विक जीवन जिएगी पलक जैन, 23 अप्रैल को दिल्ली में लेगी दीक्षा
एक और जहां बड़ा घर, एसी, गाड़ी, महंगें कपड़े और बेहतरीन नौकरी के सपने युवा देख रहें हैं, वहीं इन सभी को त्याग कर पलक जैन पूरी जिंदगी साध्वी बनकर जिएगी। पलक 23 अप्रैल को दिल्ली में दीक्षा लेने जा रही है और इससे पहले उन्होंने करीब एक साल तक साध्वी बनने के लिए वो सब किया है, जो एक साध्वी को करना चाहिए।
7 नवंबर 1996 को शहर के जाने माने व्यवसायी राजेश व त्रिशला जैन के घर में जन्मी पलक ने 12वीं तक की शिक्षा नारनौल में हासिल की। इसके बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से मैथ में एमएससी की डिग्री हासिल की। साल 2019 से 2024 तक बैंगलुरू व गुरुग्राम में नौकरी भी की। इसी दौरान प्रमोशन भी मिल गया था, लेकिन समय को कुछ और ही मंजूर था कि पलक ने सब कुछ छोड़ धर्म की राह पर चलना चुना। बता दें कि पलक से पहले दीपक सैनी व पायल सैनी भी नारनौल से दीक्षा ले चुके हैं।
मां के साथ गई थी पाली
अक्तूबर 2024 में पलक अपनी मां के साथ पाली राजस्थान में पूज्य भाग्यप्रभा जी साध्वी के दर्शन के लिए गई थी। उनके प्रवचन सुनकर पलक ने अगले दिन ही दीक्षा लेने का मन बना लिया। इसके बाद साध्वी बनने के लिए एक साल का वैराग्य काल वहीं रहकर पूरा किया।
घर से रही दूर
पलक ने बताया कि वैराग्य काल के दौरान बिन पंखे व लाइट, दरी पर सोना, नंगे पैर रहना, 32 आगम, थोकड़े व संस्कृत पढ़ना, सूर्यास्त के बाद न पानी न भोजन और सूर्याेदय के 48 मिनट बाद सात्विक भोजन करने जैसे अनेकों बेहद कठिन नित्य कर्म शामिल रहे। इसी एक साल में पाली के अलावा नंगे पैर ही पैदल पैदल जोधपुर, पीपाड़, ब्यावर, अजमेर, किशनगढ़ व जयपुर से होते हुए अपने घर पहुंची। यहां भी गत 10 दिनों में एक अलग कमरे में ही सादगी से रह रही हैं।
पलक ने बताया कि एक आम इंसान को मोक्ष प्राप्त के लिए 14 सीढ़ी पर एक एक कर चढ़ना पड़ता है, लेकिन अगर आप दीक्षा लेते हैं तो सीधे ही 7वें पायदान पर पहुंच जाते हैं। अब दीक्षा लेने के बाद न उनके पास पैसा, न फोन, भीक्षा मांगकर खाना, दो जोड़ी सफेद वस्त्र, जीवन भर न स्नान और चार पात्र होंगे। दीक्षा के वक्त अहिंसा, सत्य, अचोर्य, ब्रह्मचर्य व अपरिगृह पांच महावृत की प्रतिज्ञा लेंगी।
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