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मेरा गांव मेरी शान: कोसली में मंदिरों, परंपराओं और वीरता की अनूठी पहचान
जिले का ऐतिहासिक गांव कोसली अपनी वीरता, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं के कारण पूरे प्रदेश में विशेष पहचान रखता है। सैनिकों की संख्या के मामले में प्रदेश में अग्रणी रहने वाला यह गांव धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। गांव में बड़ी संख्या में प्राचीन मंदिर और धार्मिक स्थल मौजूद हैं, जिसके कारण इसे मंदिरों का गांव कहना गलत नहीं होगा। हरियाणा राज्य के गजट के अनुसार कोसली गांव की स्थापना वर्ष 1193 में दिल्ली के महाराजा आनंदपाल तोमर के पुत्र कौशल देव सिंह ने मठाधीश बाबा मुक्तेश्वर पुरी के आशीर्वाद से की थी। उस समय गांव के चारों ओर घना जंगल हुआ करता था, जहां शेर और चीते घूमते थे।
कर्म सिंह ने बताया कि कोसली गांव की सामाजिक अहमियत भी सदियों से बनी हुई है। आसपास के करीब 12 गांव, जिन्हें कोसलिया खेड़ा कहा जाता है, उनके सामाजिक और पारिवारिक मामलों का समाधान आज भी कोसली में ही किया जाता है। गांव की पुरानी परंपराएं और सामाजिक व्यवस्था आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई हैं। देशभर से कोसलिया गोत्र के लोग हर साल होली पर्व पर बाबा मुक्तेश्वर पुरी महाराज के मठ में माथा टेकने पहुंचते हैं। यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
मंदिर में वर्ष में दो बार विशाल मेले का होता है आयोजन
अशोक यादव ने बताया कि गांव में स्थित देवी माई के मंदिर में वर्ष में दो बार विशाल मेले का आयोजन होता है। इस मेले में दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। नवजात बच्चों के मुंडन संस्कार और नवविवाहित जोड़ों की जात भी यहां लगाई जाती है। इसके अलावा गांव में प्राचीन शिव मंदिर, शनि देव मंदिर, ठाकुर जी मंदिर, गोगाजी मंदिर और बलखड़ी मंदिर जैसे धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं, जहां सुबह-शाम श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं।
गांव अपनी अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है:
दयावान ने बताया कि कोसली गांव अपनी अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। आधुनिकता के दौर में जहां कई पारंपरिक त्योहार और लोक संस्कृतियां धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं, वहीं कोसली में आज भी सदियों पुरानी परंपराएं जीवित हैं। नवजात शिशु के जन्म पर कुआं पूजन की रस्म आज भी उसी परंपरा के साथ निभाई जाती है, जैसी करीब 800 वर्ष पहले निभाई जाती थी।
गांव में होली गायन की परंपरा भी बेहद खास:
सरपंच रामकिशन जांगड़ा ने बताया कि गांव में होली गायन की परंपरा भी बेहद खास मानी जाती है। महाशिवरात्रि से शुरू होने वाले होली गीतों का दौर फाग पर्व तक चलता है। पीढ़ी दर पीढ़ी पुराने लोकगीतों को उसी शैली में गाया जाता है, जैसे सैकड़ों वर्ष पहले गाए जाते थे। ग्रामीणों के अनुसार सदियों पहले गांव पर एक डाकू और उसके साथियों ने हमला कर दिया था। ग्रामीणों ने साहस दिखाते हुए डाकुओं के सरदार का सिर कलम कर दिया था। इसी विजय की खुशी में फाग पर्व पर विशेष आयोजन किया जाता है। गांव का धना नाई, मठाधीश महाराज, नंबरदार और ग्रामीण ठाकुर जी की प्रतिमा को सजाकर चौपाल से मठ तक लेकर जाते हैं। इसके बाद फाग मेले की शुरुआत होती है।
मेले में आने वाले चढ़ावे का हिसाब आज भी सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार रखा जाता है। चौपाल में बैठकर चढ़ावे की राशि गिनी जाती है और करीब 800 से 900 वर्ष पुरानी बहियों में उसका लेखा-जोखा दर्ज किया जाता है। यही परंपराएं कोसली गांव को सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था का जीवंत उदाहरण बनाती हैं।
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