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Mandi: आईआईटी मंडी में शुरू हुआ मन मस्तिष्क और चेतना विषय पर 4 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
Ankesh Dogra
Updated Thu, 04 Jun 2026 11:37 AM IST
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भारतवर्ष ऋषि-मुनियों की धरती रही है और मन अंतर से जुड़े चेतन तत्व पर पश्चिमी देशों के सिद्धांत को अपनाने के लिए भारत बिल्कुल भी तैयार नहीं है। चेतन तत्व ही उत्पत्ति का आधार है और आधुनिकता के दौर में इसे भुलाया भी नहीं जा सकता है। यह बात मंडी में मीडिया से रूबरू होते हुए शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार भारतीय ज्ञान प्रणाली ( आईकेएस ) प्रभाग के राष्ट्रीय समन्वयक प्रो. गंटी एस. मूर्ति ने मीडिया से रूबरू होते हुए की। प्रो. मूर्ति ने कहा कि विज्ञान और आधुनिकता के दौर में भले ही पश्चिमी देश भारत से आगे निकाल गए हों, लेकिन हजारों साल पहले के ऋषियों के ज्ञान को भारत कभी झुठला नहीं सकता है। पश्चिमी देश जड़ तत्व को उत्पत्ति का आधार मनाने आए हैं, जबकि भारत ने हमेशा ही चेतना को मूल तत्व माना है। इस चेतना को नाट्य और संगीत परंपरा में भी भली भांति महसूस किया जा सकता है। भारतीय ऋषि परंपरा, संगीत, नाट्य, शिल्प और कला परंपराओं में चेतना का यह दृष्टिकोण सदियों से स्थापित रहा है। यह केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि विश्व कल्याण का आधार भी है। इसलिए भारत से ही इस विचार को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। बुधवार को सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में बतौर मुख्यातिथि मौजूद रहीं पद्म विभूषण व प्रख्यात भरतनाट्यम नृत्यांगना डॉ. पद्म सुब्रह्मण्यम ने इस मौके पर मीडिया कर्मियों से बातचीत में भारतीय ज्ञान परंपरा को मानवता के लिए मार्गदर्शक बताते हुए कहा कि भारत की शिक्षा, दर्शन और अध्यात्म की मूल अवधारणा व्यक्ति को मुक्त करने और उसे संपूर्ण सृष्टि से जोड़ने की रही है। उन्होंने कहा कि हिमालय केवल पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का जीवंत केंद्र है। यहां आज भी वह ऊर्जा और आभा महसूस की जा सकती है जिसने सदियों तक भारतीय चिंतन को दिशा दी। भारत का ज्ञान तंत्र केवल बौद्धिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें आध्यात्मिकता, संवेदनशीलता और समावेशिता का अद्भुत समावेश है। डॉ. सुब्रह्मण्यम ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहां ईश्वर को किसी एक स्थान या स्वरूप तक सीमित नहीं माना गया। जनजातीय समाजों से लेकर सामान्य ग्रामीण तक यह मान्यता रखते हैं कि ईश्वर हर जीव और हर कण में विद्यमान है। यही दृष्टिकोण भारतीय संस्कृति को विश्व की अन्य सभ्यताओं से अलग पहचान देता है। वहीं इस मौके पर आईआईटी मंडी के निदेशक प्रो लक्ष्मीधर बेहरा ने कहा कि चेतन तत्व पर शोध करने में अभी भारत ने शुरुआत ही की है। इस विषय पर भारत को 10-15 सालों तक लगातार और सामूहिक प्रयासों के साथ कार्य करने की आवश्यकता है। विज्ञान के इस दौर में बहुत से शोध हुए और किए भी जा रहे है। ऐसे में वे चाहते हैं कि चेतन तत्व पर भी वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार ही शोध किया जाए। इस तत्व पर पश्चिमी देशों का पेटेंट का अधिकार को वे सही नहीं मानते है। आज देश आगे आकर इस विषय पर कार्य भी कर रहा है। भारत का यह कदम उसे आने वाले समय में विश्वगुरु बनाने की ओर भी बेहतर साबित होगा। बता दें कि 3 से 6 जून तक आईआईटी मंडी मन, मस्तिष्क और चेतना विषय पर 4 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। आईआईटी मंडी में आयोजित यह सम्मेलन तीसरा संस्करण है, जिसमें करीब 350 शोधपत्र प्रस्तुत किए जाएंगे। देश-विदेश से 30 से अधिक विशेषज्ञ और शोधकर्ता चेतना से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा कर रहे हैं। सम्मेलन का आयोजन शिक्षा मंत्रालय के भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) प्रभाग और आईआईटी मंडी के सहयोग से किया जा रहा है।
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