दतिया जिले में स्थित प्रसिद्ध जैन तीर्थ स्थल सोनागिर जैन मंदिर में होली का पर्व अनोखे अंदाज में मनाया जाता है। जहां देशभर में होली रंग-गुलाल और उत्साह के साथ खेली जाती है, वहीं सोनागिर गांव में बरसों से चली आ रही परंपरा के तहत ग्रामीण होली नहीं खेलते। यहां रंगों की जगह भक्ति, आस्था और आध्यात्मिकता की छटा बिखरती है।
सोनागिर पर्वत पर विराजमान सफेद संगमरमर के मंदिरों का यह समूह जैन धर्मावलंबियों के लिए अत्यंत पवित्र स्थल है। होली के अवसर पर यहां पांच दिवसीय वार्षिक मेले का आयोजन होता है, जिसमें देशभर से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। इस दौरान संपूर्ण क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है। विशेष रूप से भगवान चंद्रप्रभु की भव्य रथ यात्राएं, भजन-कीर्तन और विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं।
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मेले के तीसरे दिन भगवान चंद्रप्रभु की विशेष रथ यात्रा विभिन्न मंदिरों से निकाली जाती है। श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा और अनुशासन के साथ रथ यात्रा में शामिल होते हैं। पूरा पर्वत क्षेत्र जयकारों और भक्ति गीतों से गूंज उठता है। सफेद मंदिरों की शृंखला और पहाड़ी पर फैला शांत वातावरण यहां आने वाले लोगों को अद्भुत शांति और आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करता है।
होली के दिन जहां अन्य स्थानों पर रंगों की धूम रहती है, वहीं सोनागिर में रंग-गुलाल का प्रयोग नहीं किया जाता। गांव के लोग वर्षों से इस परंपरा का पालन करते आ रहे हैं। उनका मानना है कि पांच दिवसीय इस धार्मिक मेले में दूर-दराज से आने वाले जैन श्रद्धालुओं की आस्था और सुविधा सर्वोपरि है। रंग खेलने से मेले की पवित्रता और व्यवस्था प्रभावित हो सकती है, इसलिए ग्रामीण स्वेच्छा से होली नहीं खेलते।
गांव के लोग मेले के दौरान श्रद्धालुओं की सेवा और सहयोग में जुटे रहते हैं। बाहर से आने वाले अतिथियों के लिए व्यवस्था, मार्गदर्शन और अन्य आवश्यक सहयोग प्रदान करना वे अपना दायित्व मानते हैं। यही कारण है कि सोनागिर में होली का पर्व भक्ति और अनुशासन के साथ संपन्न होता है। पांच दिवसीय मेला समाप्त होने के बाद ग्रामीण अपने स्तर पर सादगीपूर्वक होली मनाते हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से रंग-गुलाल का आयोजन नहीं किया जाता। यह परंपरा वर्षों से कायम है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।