होली का त्योहार आमतौर पर रंग, गुलाल और उल्लास के लिए जाना जाता है। लेकिन, गुना जिले के आदिवासी-सहरिया बाहुल्य क्षेत्रों में यह पर्व सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राचीन रीति-रिवाजों के साथ मनाने की परंपरा है। होली पर बमौरी तहसील के डुमावन गांव में आदिवासी समुदाय 'लक्कड़ देवता' की पूजा करता है। इसी लक्कड़ के सहारे बनाए गए झूले पर सवार होकर फेरे भी लगाता है। इस आयोजन को देखने के लिए दूर-दराज से लोग डुमावन पहुंचते हैं।
लक्कड़ देवता की पूजा और विशेष परंपरा
दरअसल, बमौरी और आसपास के कस्बों में रहने वाला आदिवासी-पटेलिया समुदाय 'लक्कड़ देवता' को ईश्वर का स्वरूप मानता है। होली के दिन स्थापित लक्कड़ देवता की श्रद्धालु पूजा करते हैं और मन्नत मांगते हैं। जिनकी मन्नत पूरी हो जाती है, वे अगली होली पर यहां पहुंचते हैं और करीब 30 फीट ऊंचे लक्कड़ देवता के फेरे लगाते हैं। फेरों के लिए एक विशेष प्रकार का झूला बनाया जाता है, जिस पर लोगों को खड़ा रहना पड़ता है। लक्कड़ देवता के ऊपर खड़े लोग उसे झूले की तरह घुमाते हैं। अलग-अलग मन्नत के अनुसार श्रद्धालु 3, 5 या 7 फेरे लगाते हैं।
इस वर्ष हुआ भव्य आयोजन
इस बार भी बमौरी ब्लॉक के डुमावन में लक्कड़ देवता की पूजा धूमधाम से की गई। इस आयोजन में सैकड़ों श्रद्धालु शामिल हुए और पारंपरिक लोकगीतों का आनंद लिया। आदिवासी-पटेलिया समुदाय का दावा है कि डुमावन में यह आयोजन कई दशकों से किया जाता रहा है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, यही कारण है कि प्रतिवर्ष आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है।