सनातन संस्कृति में गौवंश को माता और पूजनीय स्थान प्राप्त है। वैदिक काल से ही प्रत्येक घर में भोजन बनाते समय रसोई की पहली रोटी गौ माता को देने की परंपरा रही है। लेकिन बदलती जीवनशैली, शहरीकरण और आधुनिक व्यस्तताओं के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। ऐसे समय में बाड़मेर जिले के सियानी गांव की बेटी प्रीति संजय मालू ने इस सांस्कृतिक धरोहर को बचाने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘पहली रोटी गाय की’ अभियान शुरू किया है।
कोरोना काल ने प्रीति के जीवन को एक नई दिशा दी। वर्ष 2019-20 में जब देशभर में कोरोना महामारी का संकट था, उस समय सड़कों के किनारे भूख से तड़पती बैठी गौमाता की स्थिति ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उस दौरान प्रीति को गहरा आभास हुआ कि यदि यही स्थिति बनी रही तो घर की ‘पहली रोटी गाय की’ जैसी सनातनी परंपरा पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।
ऐसे में प्रीति ने संकल्प लिया कि सनातन संस्कृति की इस वैदिक परंपरा को न केवल स्वयं निभाएंगी, बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी इससे जोड़ेंगी। इसी संकल्प के साथ प्रीति ने सितंबर 2023 में प्रीत फाउंडेशन की स्थापना की और गुजरात के नवसारी जिले से ‘पहली रोटी गाय की’ अभियान की शुरुआत की। खास बात यह रही कि अभियान की शुरुआत प्ले ग्रुप स्तर से की गई, ताकि बचपन से ही बच्चों के मन में गौमाता और सनातन संस्कृति के प्रति निष्ठा का भाव विकसित हो सके।
प्रीति मालू ने बताया कि वैदिक काल से सनातन संस्कृति में गौ माता को घर की रसोई में बनने वाली पहली रोटी खिलाने की परंपरा रही है, जो आज के समय में धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। इसी परंपरा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से ‘पहली रोटी गाय की’ अभियान शुरू किया गया। अभियान के शुरुआती दौर में गुजरात राज्य के पांच जिले नवसारी, वलसाड, सूरत, तापी और जूनागढ़ को चुना गया।
प्रीत फाउंडेशन ने स्कूलों के बच्चों को माध्यम बनाते हुए उन्हें गौसेवा और सनातन संस्कृति से जोड़ने का निर्णय लिया। प्रीति ने बताया कि बाड़मेर सहित राजस्थान और गुजरात में 100 से अधिक स्कूलों में ‘पहली रोटी गाय की’ अभियान सक्रिय है। बच्चों को सप्ताह में सिर्फ एक दिन घर में बनी ‘पहली रोटी गाय की’ लाने के लिए प्रेरित किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि आज इस अभियान से एक लाख से अधिक विद्यार्थी जुड़ चुके हैं।
प्रीति मालू ने बताया कि यह अभियान बच्चों के भीतर सनातन संस्कृति के संस्कार, जिम्मेदारी और संवेदनशील दृष्टिकोण विकसित करने का माध्यम बन रहा है। सनातन गौ वैदिक संस्कृति के उत्थान और संस्कारिक प्रयासों के लिए प्रीति मालू को वर्ष 2024 में छत्तीसगढ़ में सम्मानित भी किया गया। उन्हें राष्ट्रीय गौसेवा आयोग के अध्यक्ष द्वारा सम्मानित और पुरस्कृत किया गया था।