राजस्थान वन विभाग ने प्रदेश में दुर्लभ वन्यजीव कैरेकल (सियागोस) के संरक्षण के लिए बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत रणथंभौर टाइगर रिजर्व में 'प्रोजेक्ट कैरेकल' का औपचारिक शुभारंभ किया गया। इस परियोजना में कैरेकल के संरक्षण, उनकी संख्या और आवास को सुरक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। पेश है रणथंभौर से एक खास रिपोर्ट। इसी क्रम में 15 अप्रैल को रणथंभौर में एक विशेष कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें देशभर से आए वन्यजीव विशेषज्ञों और अधिकारियों ने हिस्सा लिया।
इस परियोजना को राजस्थान वन विभाग, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और टाइगर वॉच के संयुक्त सहयोग से संचालित किया जाएगा। अगले 18 महीनों तक रणथंभौर, धौलपुर-करौली, कोटा के मुकुंदरा टाइगर रिजर्व और बूंदी के रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में कैरेकल की मौजूदगी, उनके आवास और शिकार व्यवहार पर गहन अध्ययन किया जाएगा। अध्ययन पूरा होने के बाद संरक्षण के लिए ठोस रणनीति तैयार की जाएगी।
वन्यजीव विशेषज्ञ बोले- कैरेकल सबसे अधिक रणथंभौर
वन्यजीव विशेषज्ञ धर्मेंद्र खांडल के अनुसार कैरेकल राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, रणथंभौर और धौलपुर-करौली क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके अलावा यह गुजरात के कच्छ और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी देखा जाता है। राजस्थान में इसकी सबसे अधिक संख्या रणथंभौर में पाई जाती है। अनुमान के मुताबिक राज्य में 100 से अधिक कैरेकल मौजूद हैं, जिनमें 35 से 40 केवल रणथंभौर क्षेत्र में हैं। प्रोजेक्ट के पहले चरण में कैरेकल की सटीक गणना, उनके आवास, घासभूमि और पारिस्थितिकी से जुड़ा डेटा एकत्र किया जाएगा। इसके बाद आवश्यकता पड़ने पर ब्रीडिंग सेंटर स्थापित करने पर भी विचार किया जाएगा।
250 स्थानों पर लगाए गए थे कैमरा ट्रैप
साल 2020 में रणथंभौर में कैरेकल को लेकर विशेष सर्वे किया गया था, जिसमें 250 से अधिक स्थानों पर कैमरा ट्रैप लगाए गए थे। उस सर्वे में 30 से 35 कैरेकल की पुष्टि हुई थी। वर्तमान में रणथंभौर में लगभग 35 से 40 कैरेकल मौजूद हैं। विशेषज्ञों के पास इनके 450 से अधिक फोटो रिकॉर्ड भी उपलब्ध हैं, जो इस प्रोजेक्ट में अहम भूमिका निभाएंगे।
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ब्रीडिंग सेंटर पर विचार किया जा सकता है विचार- डीएफओ
रणथंभौर के डीएफओ मानस सिंह ने बताया कि पहले चरण में विस्तृत सर्वे किया जाएगा। यदि कैरेकल की संख्या कम पाई जाती है तो उनके संरक्षण के लिए ब्रीडिंग सेंटर पर विचार किया जाएगा, और यदि संख्या पर्याप्त रहती है तो उनके प्राकृतिक संरक्षण और आवास सुधार पर काम किया जाएगा।
कैरेकल एक फुर्तीली और शिकारी जंगली बिल्ली
कैरेकल को भारत में सियागोश भी कहा जाता है, एक फुर्तीली और शिकारी जंगली बिल्ली है। जो हवा में ऊंची छलांग लगाकर उड़ते पक्षियों का शिकार करने की अद्भुत क्षमता के लिए जानी जाती है। इसका नाम 'कैरेकल' तुर्की भाषा के शब्द 'कराकुलक' से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है 'काले कान वाला प्राणी', जो इसके लंबे काले कानों की पहचान को दर्शाता है। भारत में इसे फारसी शब्द 'सियागोश' से जाना जाता है, जिसका अर्थ भी काले कानों वाला जीव है। कैरेकल दुनिया के लगभग 60 देशों में पाया जाता है, खासकर अफ्रीका और इजरायल में इसकी अधिकता है। भारत में यह बहुत सीमित इलाकों में मिलता है और पिछले 20-25 वर्षों में केवल राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात में ही इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है। इसकी लंबाई लगभग 31 इंच और वजन 8 से 9 किलो तक होता है। यह स्वभाव से बेहद शर्मीला लेकिन बहुत तेज और सक्रिय शिकारी होता है।