प्रदेश के सबसे बड़े रणथंभौर टाइगर रिजर्व में कभी बाघों की संख्या महज 25 थी, लेकिन अब यह बढ़कर 77 तक पहुंच चुकी है। पिछले 53 वर्षों में न केवल बाघों की संख्या बढ़ी है, बल्कि उनकी गणना का तरीका भी पूरी तरह बदल गया है। पहले जंगल में बाघों के पंजों के निशानों के आधार पर गणना की जाती थी, जबकि अब हाईटेक कैमरा ट्रैप और वैज्ञानिक तकनीक की मदद से उनकी सटीक पहचान की जा रही है।
रणथंभौर टाइगर रिजर्व के डीएफओ मानस सिंह ने बताया कि पूरे 1700 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में करीब 300 मॉनिटरिंग पॉइंट बनाए गए हैं। प्रत्येक पॉइंट पर दो-दो कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। इस तरह कुल 600 कैमरों के जरिए बाघों की गणना की जा रही है। सामान्य दिनों में भी 250 से 300 कैमरा ट्रैप लगातार सक्रिय रहते हैं, ताकि बाघों की नियमित निगरानी की जा सके। रणथंभौर में बाघों की संख्या अधिक होने के कारण यहां अन्य क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा कैमरों की आवश्यकता पड़ती है।
पढे़ं: 'भारत के आदिवासी ही इंडिजिनस पीपुल्स हैं': सांसद रोत के बयान से गरमाई सियासत, भाजपा बोली- ऐसा बयान उचित नहीं
उन्होंने बताया कि करीब चार वर्ष पहले राजस्थान के टाइगर रिजर्व में वॉटर होल पद्धति से होने वाली गणना बंद कर दी गई थी। अब राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) की टाइगर सेल द्वारा निर्धारित वैज्ञानिक पद्धति के तहत कैमरा ट्रैप के माध्यम से गणना की जाती है। गणना का अंतिम आंकड़ा एनटीसीए जारी करेगा। इसमें टाइगर रिजर्व के साथ-साथ सोशल फॉरेस्ट्री क्षेत्रों में बाघों की आवाजाही का डेटा भी शामिल रहेगा।
कैमरा ट्रैप में कैद तस्वीरों के आधार पर बाघों की पहचान उनके शरीर पर बनी धारियों (स्ट्राइप पैटर्न) से की जाती है। जिस प्रकार हर व्यक्ति के फिंगरप्रिंट अलग होते हैं, उसी तरह हर बाघ की धारियों का पैटर्न भी अलग होता है। इसी विशिष्ट पहचान के आधार पर प्रत्येक बाघ की सटीक गणना की जाती है।