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गणतंत्र की चेतना और 1857 की विरासत-राजा देवी बख्श सिंह की स्मृतियों में आज भी धड़कता है गोंडा
गणतंत्र दिवस केवल संविधान की वर्षगांठ नहीं, बल्कि उस संघर्ष, बलिदान और चेतना का उत्सव है। इसकी नींव 1857 की क्रांति में पड़ी थी। आज जब देश 26 जनवरी को लोकतांत्रिक मूल्यों का उत्सव मनाता है, तब गोंडा की धरती पर जन्मे 1857 के महानायक महाराजा देवी बख्श सिंह की स्मृतियां स्वतः ही जीवंत हो उठती हैं। वह नायक, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने से इन्कार किया और अवध की क्रांति को निर्णायक दिशा दी।
ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जब पूरे देश में विद्रोह की चिंगारी फूट रही थी, उसी समय गोंडा और उससे सटे लखनऊ क्षेत्र में भी क्रांति की ज्वाला धधकने लगी थी। लखनऊ में बेगम हजरत महल अंग्रेजों के विरुद्ध अवध क्रांति का नेतृत्व कर रही थीं। ऐसे निर्णायक समय में उन्होंने गोंडा के महाराजा देवी बख्श सिंह को सहायता के लिए पत्र भेजा। 5 जुलाई 1857 को बेगम की शाही सेना के कैप्टन गजाधर पांडेय वह मार्मिक अनुरोध पत्र लेकर गोंडा पहुंचे, जिसमें अवध के छीने गए राज्य, अवयस्क उत्तराधिकारी और बेगम हजरत महल के सम्मान की रक्षा के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध कमान संभालने का आह्वान था। इस पत्र ने महाराजा देवी बख्श सिंह को भीतर तक झकझोर दिया और वे अपनी सेना के साथ घाघरा पार कर लखनऊ की ओर कूच कर गए।
महाराजा देवी बख्श सिंह केवल गोंडा-बहराइच के प्रधान नाजिम ही नहीं थे, बल्कि बस्ती और बाराबंकी के आठ रजवाड़ों को मिलाकर कुल 30 रजवाड़ों के नायक के रूप में उन्हें क्रांति के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। फरवरी 1856 में अवध के ब्रिटिश विलय के बाद जब कर्नल ब्वायलू ने उनसे मिलने का संदेश भेजा, तो महाराजा ने अंग्रेजी सत्ता को मान्यता देने से साफ इंकार कर दिया। इसके परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने गोंडा रियासत के 400 गांवों में से 30 गांव छीन लिए। बेगम हजरत महल के आमंत्रण पर महाराजा करीब तीन हजार सैनिकों के साथ लखनऊ पहुंचे और अंग्रेजों के खिलाफ कई निर्णायक युद्ध लड़े। चौकाघाट की लड़ाई के बाद जब बेगम को लखनऊ छोड़ना पड़ा, तब महाराजा ने बेलवा के समीप अपना सैन्य शिविर स्थापित किया। यहां दो तोपों और 800 सैनिकों के साथ बेलवा को अपने नियंत्रण में लिया गया। नवंबर 1857 में गोंडा क्रांतिकारी गतिविधियों का बड़ा केंद्र बन गया और 25 नवंबर से 6 दिसंबर 1857 तक अंग्रेजों और क्रांतिकारियों के बीच भीषण युद्ध हुआ। हालांकि जनरल होपग्रांट की विशाल सेना ने 25 नवंबर 1858 को घाघरा पार कर महाराजा की सेना को तितर-बितर कर दिया, लेकिन महाराजा देवी बख्श सिंह अंत तक अंग्रेजों के सामने नहीं झुके।
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