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एक गांव जो नहीं मनाता नागपंचमी: मुगलों के खिलाफ शहीद हुए थे बाबू रामनारायण, 341 साल बाद भी नहीं मनाते नागपंचमी
Mon, 17 Aug 2026 12:13 PM IST
Rohit Singh
श्रीकांत शाही, संवाद न्यूज एजेंसी/ चिल्लूपार
श्रीकांत शाही, संवाद न्यूज एजेंसी/ चिल्लूपार
Published by: Rohit Singh
Updated Mon, 17 Aug 2026 12:13 PM IST
सार
बैरियाडीह गांव निवासी वंशज रमेश शाही, कमलेश शाही और गौरव प्रताप शाही बताते हैं कि कर न चुका पाने पर बाबू रामनारायण शाही को गांव में लगाए गए मुगल दरबार में प्रस्तुत किया गया। वहां उनसे धर्म परिवर्तन कर इस्लाम स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा गया, लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया।
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शहीद स्व. बाबू रामनारायण शाही की फाइल फोटो
- फोटो : स्त्रोत-परिजन
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विस्तार
देशभर में नागपंचमी का पर्व श्रद्धा, आस्था और उल्लास के साथ मनाया जाता है लेकिन जनपद के बड़हलगंज विकास खंड अंतर्गत बैरियाडीह गांव में यह दिन उत्सव का नहीं बल्कि अपने पूर्वज के बलिदान को बैरियाडीह में पर्व नहीं, पूर्वज बाबू रामनारायण शाही के बलिदान का होता है स्मरण नमन करने का अवसर होता है।
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गांव के विसेन क्षत्रिय परिवार आज भी नागपंचमी नहीं मनाते। पारिवारिक स्मृतियों के अनुसार यह परंपरा बाबू रामनारायण शाही के बलिदान से जुड़ी है जिन्होंने मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में धर्म परिवर्तन स्वीकार करने से इन्कार कर दिया था।
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परिजन रमेश शाही, कमलेश शाही, उमेश शाही, गौरव प्रताप शाही के अलावा वैभव शाही के अनुसार हमारे पूर्वज बाबू रामनारायण शाही का जन्म 25 जनवरी 1625 को बैरियाडीह गांव के प्रतिष्ठित जमींदार बाबू सूरसेन शाही और माता सुनीता शाही के घर हुआ था।
धार्मिक संस्कारों में पले-बढ़े रामनारायण शाही ने पिता के निधन के बाद जमींदारी की जिम्मेदारी संभाली। उस समय राप्ती और सरयू नदियों के बीच स्थित यह क्षेत्र प्रतिवर्ष बाढ़ की चपेट में आता था जिससे खेती प्रभावित होती थी और लगान व जजिया कर का भुगतान कठिन हो जाता था।
धार्मिक संस्कारों में पले-बढ़े रामनारायण शाही ने पिता के निधन के बाद जमींदारी की जिम्मेदारी संभाली। उस समय राप्ती और सरयू नदियों के बीच स्थित यह क्षेत्र प्रतिवर्ष बाढ़ की चपेट में आता था जिससे खेती प्रभावित होती थी और लगान व जजिया कर का भुगतान कठिन हो जाता था।
बैरियाडीह गांव निवासी वंशज रमेश शाही, कमलेश शाही और गौरव प्रताप शाही बताते हैं कि कर न चुका पाने पर बाबू रामनारायण शाही को गांव में लगाए गए मुगल दरबार में प्रस्तुत किया गया। वहां उनसे धर्म परिवर्तन कर इस्लाम स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा गया, लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया।
परिजन के अनुसार, इसके बाद सावन महीने की नागपंचमी, आठ अगस्त 1680 को उन्हें गांव में तोप के मुंह से बांधकर मृत्युदंड दिया गया। घटना के बाद से उनके वंशजों ने नागपंचमी का पर्व न मनाने का संकल्प लिया जो आज भी अक्षुण्ण है। यह परंपरा पीढ़ियों से आज भी सम्मान पूर्वक निभाई जाती है।
परिजन के अनुसार, इसके बाद सावन महीने की नागपंचमी, आठ अगस्त 1680 को उन्हें गांव में तोप के मुंह से बांधकर मृत्युदंड दिया गया। घटना के बाद से उनके वंशजों ने नागपंचमी का पर्व न मनाने का संकल्प लिया जो आज भी अक्षुण्ण है। यह परंपरा पीढ़ियों से आज भी सम्मान पूर्वक निभाई जाती है।