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मोहब्बत, कत्ल और जेल, खूनी लव स्टोरी में खतरनाक 'खेल', जिस प्यार में बन गए 'कातिल' वो भी 'फेल'
शिवम सिंह, गोरखपुर
Published by: विजय जैन
Updated Sun, 02 Feb 2020 08:45 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
आपको शिखा दुबे और दीपू , याद हैं क्या ? सात लाख की शहरी आबादी में दो नाम, याद रखना मुश्किल होगा। चलिए एक क्लू और देते हैं, वे एक-दूसरे की मुहब्बत में पागल थे, कुछ याद आया ? एक-दूसरे को पाने के लिए घर छोड़ा था।
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उस मोहब्बत का क्या अंजाम हुआ, यकीनन हर किसी का जवाब होगा कि जेल में अपनी करनी की सजा भुगत रहे होंगे या जेल से बाहर आए होंगे तो शादी कर ली होगी। बिल्कुल गलत। दरअसल, जमानत पर जेल से बाहर के आने के बाद दोनों अलग-अलग शादी करके अपनी एक अलग ही दुनिया बसा चुके हैं। शायद इसी को कहते हैं विधि का विधान।
प्यार को पाने के लिए रची गई एक ऐसी साजिश जिसकी जद में आकर एक महिला की जिंदगी खत्म हो गई, तो उसकी मासूम बच्ची अनाथ हो गई, मगर वह मोहब्बत परवान नहीं चढ़ पाई।
प्यार को पाने के लिए रची गई एक ऐसी साजिश जिसकी जद में आकर एक महिला की जिंदगी खत्म हो गई, तो उसकी मासूम बच्ची अनाथ हो गई, मगर वह मोहब्बत परवान नहीं चढ़ पाई।
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चलिए हम आपको जून 2011 के उन दिनों के गोरखपुर में ले चलते हैं। 11 जून की बात है। सिंघाड़िया में एक युवती की लाश मिली थी। उसकी कद काठी और उम्र कुछ वैसी थी, जैसी इंजीनियरिंग कॉलेज के कमलेशपुरम कॉलोनी इलाके से गायब युवती शिखा दुबे की। पिता को बुलाया गया, घरवाले, रिश्तेदार भी जुटे सबने माना लाश शिखा की है।
पिता राम प्रकाश दुबे ने पड़ोसी दीपू पर आशंका जताई और हत्या का केस दर्ज करा दिया। पुलिस-मीडिया ने घटना को नाम दिया शिखा दुबे हत्याकांड । पुलिस तहकीकात में ज़ुट गई। उपलब्ध टेलीफोन नंबरों को सर्विलांस पर लगाया गया, मगर कोई खास मदद नहीं मिली । यह वह दौर था जब पुलिस के पास न तो आज जैसी उन्नत तकनीकी थी, न ही सर्विलांस के उतने तेज तर्रार लोग ।
पुलिस ने अपने पुराने मुखबिर तंत्र पर भरोसा किया। खबर मिली कि दीपू सोनभद्र में है। सोनभद्र पहुंचकर पुलिस टीम के सामने जो वाकया आया वह हैरान कर देने वाला था। न केवल दीपू,वहां तो शिखा भी मौजूद थी। वो भी जिंदा। पुलिस की सख्ती पर दोनों ने मुंह खोला तो जो कहानी ऊभर कर सामने आई उसका केंद्र मोहल्ला कमलेशपुरम था।
पिता राम प्रकाश दुबे ने पड़ोसी दीपू पर आशंका जताई और हत्या का केस दर्ज करा दिया। पुलिस-मीडिया ने घटना को नाम दिया शिखा दुबे हत्याकांड । पुलिस तहकीकात में ज़ुट गई। उपलब्ध टेलीफोन नंबरों को सर्विलांस पर लगाया गया, मगर कोई खास मदद नहीं मिली । यह वह दौर था जब पुलिस के पास न तो आज जैसी उन्नत तकनीकी थी, न ही सर्विलांस के उतने तेज तर्रार लोग ।
पुलिस ने अपने पुराने मुखबिर तंत्र पर भरोसा किया। खबर मिली कि दीपू सोनभद्र में है। सोनभद्र पहुंचकर पुलिस टीम के सामने जो वाकया आया वह हैरान कर देने वाला था। न केवल दीपू,वहां तो शिखा भी मौजूद थी। वो भी जिंदा। पुलिस की सख्ती पर दोनों ने मुंह खोला तो जो कहानी ऊभर कर सामने आई उसका केंद्र मोहल्ला कमलेशपुरम था।
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इस सनसनीखेज कहानी में पांच किरदार थे। शिखा (23) दुबली-पतली। किसी की भी नजर टिक जाए। पड़ोसी दीपू (26)। उसकी नजरें, शिखा से कुछ यूं मिली कि आग दोनों के दिलों में भड़क उठी। कहने को तो यह मोहब्बत थी, मगर विधि अपना विधान पूरा करने की भूमिका रच रही थी। पांच परिवारों की बर्बादी, बदनामी, एक महिला की मौत, एक बच्ची के सिर से मां का साया छीनने की भूमिका।
विधि का जाल बिछ चुका था, दीपू और शिख, घर से भागने और पीछे घर में होने वाले बवाल से बचने के लिए खतरनाक साजिश रच चुके थे। तय हुआ कि शिखा की कद काठी की किसी महिला की हत्या कर उसे शिखा की पहचान दे दी जाए। इस साजिश के साथ इसमें कहानी के तीसरे किरदार सुग्रीव (35)की एंट्री हुई। दीपू का दोस्त। दीपू का ट्रांसपोर्ट का कारोबार था। उसका अक्सर सोनभद्र जिले जाना होता था, वहां एक ऐसी लड़की थी, जिसकी कद-काठी शिखा से बहुत मिलती थी। यहीं से कहानी की चौथी किरदार पूजा (25) सामने आई। पूजा तीन साल की बच्ची की मां थी और जरूरतमंद भी। दीपू-सुग्रीव उसे गोरखपुर में तीन हजार रुपये की नौकरी के बहाने ले आए।
विधि का जाल बिछ चुका था, दीपू और शिख, घर से भागने और पीछे घर में होने वाले बवाल से बचने के लिए खतरनाक साजिश रच चुके थे। तय हुआ कि शिखा की कद काठी की किसी महिला की हत्या कर उसे शिखा की पहचान दे दी जाए। इस साजिश के साथ इसमें कहानी के तीसरे किरदार सुग्रीव (35)की एंट्री हुई। दीपू का दोस्त। दीपू का ट्रांसपोर्ट का कारोबार था। उसका अक्सर सोनभद्र जिले जाना होता था, वहां एक ऐसी लड़की थी, जिसकी कद-काठी शिखा से बहुत मिलती थी। यहीं से कहानी की चौथी किरदार पूजा (25) सामने आई। पूजा तीन साल की बच्ची की मां थी और जरूरतमंद भी। दीपू-सुग्रीव उसे गोरखपुर में तीन हजार रुपये की नौकरी के बहाने ले आए।
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वह दस जून की स्याह रात थी। पूजा सुग्रीव के साथ ट्रक से कूड़ाघाट आई। नौकरी और सुनहरे भविष्य की आस में। उधर, शिखा- दीपू के साथ घर से भागकर कुसम्ही जंगल पहुंच गई। जंगल में ट्रक में सवार पूजा को शिखा ने वह कपड़ा पहना दिए जिसे पहनकर वह घर से निकली थी। इतना ही नहीं उसके गले में एक धागा डाला गया जो शिखा हमेशा पहनती थी। इसके बाद ट्रक में ही पूजा की हत्या कर दी गई।
इस कत्ल में कहानी का पांचवा किरदार ट्रक का खलासी बलराम भी चंद रुपये के लालच में शामिल हो गया। हत्या के बाद सबने पूजा की लाश का चेहरा धारदार हथियार से इस कदर बिगाड़ दिया कि चेहरे से असल की पहचान ना हो सके। फिर सिंघड़िया के पास लाकर शव को फेंक दिया गया था। इस हत्या का आरोपी बनाते हुए पुलिस ने शिखा और दीपू को जेल भेज दिया, बाद में दोनों जमानत पर रिहा हो गए। केस अदालत में चल रहा है।
(कहानी आरोप पत्र और विभिन्न किरदारों के परिवारों से मिली जानकारी के आधार पर)
इस कत्ल में कहानी का पांचवा किरदार ट्रक का खलासी बलराम भी चंद रुपये के लालच में शामिल हो गया। हत्या के बाद सबने पूजा की लाश का चेहरा धारदार हथियार से इस कदर बिगाड़ दिया कि चेहरे से असल की पहचान ना हो सके। फिर सिंघड़िया के पास लाकर शव को फेंक दिया गया था। इस हत्या का आरोपी बनाते हुए पुलिस ने शिखा और दीपू को जेल भेज दिया, बाद में दोनों जमानत पर रिहा हो गए। केस अदालत में चल रहा है।
(कहानी आरोप पत्र और विभिन्न किरदारों के परिवारों से मिली जानकारी के आधार पर)