हर वर्ष 23 मई को दुनिया भर में कछुओं के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए विश्व कछुआ दिवस मनाया जाता है। घड़ियालों के घर कह जाने वाले चंबल में ही कछुओं की सॉल प्रजाति बची है। कोरोना काल में चंबल में मौजूद 10 प्रजाति के कछुओं की रिकॉर्ड नेस्टिंग हुई थी। हैचिंग में जन्मे 5000 बच्चे चंबल की गोद में पहुंच गए हैं। हाल ही में कछुओं की लुप्तप्राय प्रजाति ढोर के 1200 बच्चे भी चंबल नदी में छोड़ गए। जीपीएस से लोकेशन ट्रैस कर वन विभाग अंडों की निगरानी कर रहा था। हैचिंग के बाद ये बच्चे नदी तक पहुंचाए गए। बता दें कि आगरा जिले के बाह क्षेत्र में वन विभाग और टर्टल सर्वाइवल एलायंस (टीएसए) 11 साल से चंबल में कछुओं के संरक्षण पर काम कर रहे हैं। जिसके सुखद परिणाम भी सामने आए हैं। टीएसए के प्रोजेक्ट ऑफिसर पवन पारीक ने बताया कि शोध में कछुओं की सॉल प्रजाति सिर्फ चंबल में बची है। जबकि कछुओं की ढोर प्रजाति चंबल में बड़ी संख्या में है। चंबल के अलावा गंगा नदी में सिर्फ 1-2 प्रतिशत आबादी बची है।
विश्व कछुआ दिवस: 'घड़ियालों के घर' में बढ़ रहा कछुओं का कुनबा, रोमांचित करती हैं ये तस्वीरें
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चंबल नदी में सॉल, ढोर के अलावा सुंदरी, मोरपंखी, कटहवा, भूतकाथा, स्योत्तर, पचेड़ा, पार्वती, पहाड़ी त्रिकुटकी कछुओं की कोरोना काल में रिकार्ड नेस्टिंग हुई है। हैचिंग पीरियड चल रहा है। बाह के रेंजर आरके सिंह राठौड़ ने बताया कि हैचिंग में जन्मे 5000 बच्चे चंबल नदी की गोद में पहुंच गए है। हैचिंग के मद्देनजर वन विभाग इनकी नियमित निगरानी कर रहा है।
नमामि गंगे अभियान के तहत चंबल के ढोर प्रजाति के कछुओं को गंगा की सफाई के लिए चुना गया है। कुकरैल प्रजनन केंद्र लखनऊ की टीम चंबल से ढोर प्रजाति के कछुओं के अंडे ले गई थी। टर्टल सर्वाइवल एलायंस की टीम की देखरेख में इनकी हैचिंग होगी और वयस्क होने पर नदी में छोड़े जाएंगे।
इटावा और बाह रेंज से नेस्टिंग सीजन में टर्टल सर्वाइवल एलायंस की टीम अंडों को जमाकर गढ़ायता कछुआ संरक्षण केंद्र में बनाई हैचरी में रखती है। टीएसए के प्रोजेक्ट ऑफीसर पवन पारीक ने बताया कि इस साल तीन सौ नेस्ट हैचरी में थे। हैचिंग में जन्मे 5000 बच्चों को दोनों रेंजों के जिन घाटों से अंडे जुटाए थे, उन्हीं पर छोड़ दिया गया है।
बाढ़ और चोरी छिपे होने वाले खनन और मछली पकड़ने के लिए डाले गए जाल में फंसकर होने वाली मौत से कछुओं की आबादी नहीं बढ़ रही थी। वन विभाग के साथ टीएसए के जागरूकता अभियान से हालात बदले है। नेस्टिंग से लेकर हैचिंग सीजन तक अंडों की रखवाली से भी इनकी संख्या में इजाफा हुआ है। रेंजर आरके सिंह राठौड़ ने बताया कि बाह रेंज में तस्करी को कड़ाई से रोका गया है।