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तंबुओं की नगरी फिर गुलजार: आस्था का वास... कल्पवासियों का डेरा; संगम की रेती पर कल्पवास करने का अक्षय पुण्य

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: शाहरुख खान Updated Sat, 03 Jan 2026 10:19 AM IST
सार

यूपी के प्रयागराज में एक बार फि से तंबुओं की नगरी गुलजार हो गई है। आज से शुरू कल्पवास एक फरवरी को माघी पूर्णिमा पर पूर्ण होगा। प्रयागराज में कल्पवास करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

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magh mela 2026 prayagraj immeasurable merit of performing Kalpavas Faith resides on banks of Sangam
magh mela 2026 prayagraj - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
प्रयागराज में संगम की रेती पर शनिवार को पौष पूर्णिमा के पहले स्नान पर्व के साथ ही माघ मेला ही नहीं कल्पवास भी शुरू हो गया। ऐसी मान्यता है कि माघ मास में सभी देवी-देवता प्रयागराज में ही वास करते हैं, इसलिए यहां पौष पूर्णिमा से कल्पवास की शुरुआत होती है। प्रयागराज में कल्पवास करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।


संगम की रेती पर बने तंबुओं में गृहस्थ और साधु-संत कल्पवास करते हैं। कल्पवास में लोगों की दिनचर्या नियमित और संयमित होती है। अखिल भारतीय दंडी संन्यासी परिषद के संरक्षक स्वामी महेशाश्रम महाराज के मुताबिक पौष पूर्णिमा पर जो श्रद्धालु कल्पवास के लिए आते हैं, उन्हें सबसे पहले संगम तट पहुंचने पर गणेश पूजन करना चाहिए।
 
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माघ मेला क्षेत्र स्थित खाक चौक में स्नान ध्यान के बाद धुनी के सामने बैठे साधु - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
इसके बाद गंगा पूजन और रेत से पिंडी बनाकर सभी देवी-देवताओं का पूजन करना चाहिए। इसके बाद श्रद्धालु अपने शिविर में पहुंचते हैं। जहां शिविर के बाहर तुलसी और कदली का पौधा रोपने का विधान है।

 
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पौष पूर्णिमा स्नान पर्व को लेकर मेला क्षेत्र में जाते कल्पवासी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
स्वामी बताते है कि प्रयाग, माघ और कल्पवास तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इसका पौराणिक और शास्त्र वर्णित है कि श्रद्धालु पौष पूर्णिमा पर गंगा स्नान कर कल्पवास का संकल्प लेकर एक माह का कठिन तप और व्रत की शुरुआत करते हैं। इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
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Magh Mela 2026 - फोटो : अमर उजाला
तीन पहर गंगा स्नान और भूमि पर शयन करते हैं। एक पहर गुरु को भोजन कराने के बाद भोजन ग्रहण करते हैं। अपनी कुटिया में देवी-देवताओं की पूजा अर्चना के साथ ही रामायण और गीता का पाठ करते हैं। संत महात्माओं की कथाओं और प्रवचन का श्रवण करते हैं।
 
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मेला क्षेत्र में कल्पवास के लिए वाहनों पर सवार होकर श्रद्धालु पहुंचे - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
इस तरह से माघी पूर्णिमा तक कल्पवास का संकल्प चलता रहता है। कल्पवास पूरा होने पर श्रद्धालु भगवान सत्यनारायण की कथा का श्रवण कर आध्यात्मिक ऊर्जा बटोर कर अपने घर को लौटते हैं। वहीं, माघी पूर्णिमा के बाद भी कई साधु-संत और कल्पवासी मेले में बने रहते हैं। बताते है कि वे त्रिजटा स्नान के बाद अपने आश्रम व घरों के लिए वापसी करते हैं।

 
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