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यूपी की इस सीट पर भाजपा कांग्रेस में घमासान, एक प्रत्याशी की अटल बिहारी बाजपेयी ने की थी पैरवी

आदर्श त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Fri, 29 Mar 2019 04:07 PM IST
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congress vs bjp in lok sabha elections 2019
राहुल गांधी, पीएम मोदी (फाइल फोटो)
लोकसभा चुनाव 2019 में कहावत 'इतिहास खुद को दोहराता है' सच होने जा रही है। यूपी के कानपुर की लोकसभा सीट पर कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों के मामले यह कहावत पूरी तरह से लागू हो रही है। करीब 14 साल बाद कांग्रेस के श्रीप्रकाश जायसवाल और भाजपा के सत्यदेव पचौरी एक बार फिर चुनावी रण में एक-दूसरे के सामने हैं।

 

 

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श्रीप्रकाश जायसवाल-सत्यदेव पचौरी
2004 में हुए लोकसभा चुनाव में भी कमोबेश वर्तमान स्थितियों में ही दोनों ने चुनावी रण में दांव आजमाया था। उस समय जायसवाल ने जीत हासिल की थी। श्रीप्रकाश खेमा एक बार फिर परिणाम का इतिहास दोहराने की कोशिश में है, तो पचौरी खेमे ने इतिहास बदलने की कवायद शुरू कर दी है। वर्ष 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पैरवी पर पचौरी को लोकसभा का टिकट मिला था।
 

 

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अटल बिहारी बाजपेयी- सत्यदेव पचौरी
ब्राह्मण बहुल शहर सीट पर 2004 में जायसवाल के अलावा सपा के मुस्लिम प्रत्याशी हाजी मुश्ताक सोलंकी भी मैदान थे। सोलंकी के मैदान में उतरने से शहर के मुस्लिम मतदाताओं ने खुलकर सपा का समर्थन किया। इससे आमतौर पर कांग्रेस के पक्ष में रहने वाला परंपरागत मुस्लिम मतदाता पार्टी से छिटक गया। इस चुनाव में सोलंकी को करीब डेढ़ लाख वोट मिले। ऐसे में कांग्रेस और भाजपा के बीच अन्य वर्ग के वोटों के लिए सीधी लड़ाई हो गई।

 

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पीएम मोदी (फाइल फोटो) - फोटो : संजय गुप्ता
वरिष्ठ पत्रकार मनोज त्रिपाठी ने बताया कि कांग्रेस से मुस्लिम मतदाताओं की दूरी होने से पचौरी ब्राह्मण बहुल सीट पर सीधी लड़ाई में आ गए। इसके बावजूद पचौरी के चुनाव हारने के तीन प्रमुख कारण रहे। पहला तो टिकट की खींचतान में पचौरी को पार्टी की अंदरूनी कलह से जूझना पड़ा। टिकट मांग रहे पार्टी के एक मजबूत धड़े ने अंदरखाने पचौरी का विरोध कर दिया।

 
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पीएम मोदी एवं प्रियंका गांधी (फाइल फोटो)
सीसामऊ विधानसभा में पार्टी के पूर्व विधायक का सक्रिय न होना और ब्राह्मणों का 1999 सरीखा जुड़ाव न होने से पासा पलट गया। भाजपा ने 1999 का चुनाव वोट अटल को, वोट कमल को नारे के साथ लड़ा था। इससे ब्राह्मण खुद का भाजपा से जुड़ाव महसूस करते थे। 2004 में इंडिया शाइनिंग के नारे के साथ ब्राह्मण खुद को जोड़ नहीं पाए। 

 
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