जम्मू-कश्मीर के शोपियां में शहीद हुए मेरठ के मेजर मयंक विश्नोई का आज दोपहर उनके पैतृक आवास पर पहुंचा, जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। वहीं, शहादत के बाद छोटे भाई मयंक की बातें याद कर बहन तनु और अनु फफक पड़ती हैं। वह कह रही हैं कि जो बात कहता था आज वह सच हो गई। बहन तनु ने बताया कि मयंक हमेशा से ही दुश्मनों को चित करने के लिए सबसे आगे रहता था। घर पर जब भी आता था तो कहता था कि तुम्हारा भाई ऐसे ही नहीं है ऑपरेशन के दौरान हमेशा आगे रहता है। बहनें बताती हैं कि उनका भाई खुशमिजाज, हरफनमौला और नेकदिल इंसान था। बता दें कि शहीद मेजर मयंक विश्नोई अपना शौर्य चक्र भी एक सैन्य अधिकारी को दान कर चुके थे।
शहादत: खुशमिजाज, हरफनमौला और दिलेर थे मेजर मयंक विश्नोई, दान कर दिया था शौर्य चक्र, कमांडो की ली थी ट्रेनिंग
बड़ी बहन तनु कहती हैं कि मयंक जब भी आता तभी कहता, क्या दीदी! सिरदर्द की गोली खाती रहती हो, गोली खानी है तो देश के लिए खाओ। दोनों बहनें भाई की शहादत की खबर सुनकर बेड पर गुमसुम बैठी रहीं।
बहनें कभी एक दूसरे से लिपटकर रोने लगतीं, तो कभी मोबाइल पर भाई की फोटो को एकटक देखकर आंखों से आंसू पौंछने लगतीं। बहनों को भाई की शहादत पर गर्व है लेकिन भाई के जाने के दुख ने उन्हें तोड़ दिया है।
बहन तनु ने बताया कि अंतिम बार बात 22 अगस्त को ही हुई थी। उन्होंने बताया कि फोन पर मयंक से बहुत कम बात होती थी। इसलिए वह वीडियो कॉल पर कभी-कभी बात करता था। उसने रक्षाबंधन के दिन अपनी यूनिट से ही राखी लेकर अपने हाथ में बांध ली थी। हमारी जब उससे वीडियो कॉल पर बात की तो बोला-देखो दीदी मैंने राखी बांध ली है। अब ऑपरेशन पर जा रहा हूं।
बड़ी बहन तनु ने बताया कि उन्होंने मयंक की राखी को पत्नी स्वाति के घर भेज दिया था। रक्षाबंधन पर स्वाति अपने मायके गई हुई थी। स्वाति ने अपने दोनों हाथों में राखी बांधी तो मयंक की मां ने पूछा कि ऐसा क्यों किया। पत्नी ने कहा कि एक हाथ में अपने लिए और दूसरे हाथ में मयंक के लिए राखी बांधी है। बहन तनु और अनु मोबाइल में भाई के फोटो देखकर सिहर उठती हैं। वह बार-बार फफक कर कहती हैं कि ऐसा होगा कभी सोचा नहीं था।
दरअसल शोपियां में 27 अगस्त को हुई एक आतंकी मुठभेड़ में मेजर मयंक विश्नोई के सिर में गोली लग गई थी। वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्हें तुरंत उधमपुर के सैनिक अस्पताल में भर्ती कराया गया।
परिजनों को जैसे ही उनके घायल होने की सूचना मिली तो वे उधमपुर पहुंच गए। जिसके बाद उनके माता पिता व बहनें वापस आ गईं थीं लेकिन पत्नी स्वाति उनके साथ ही रुक गईं थी। शनिवार को मेजर मयंक ने सैनिक अस्पताल में उपचार के दौरान अंतिम सांस ली।
मेजर मयंक को वीरता के लिए शौर्य चक्र मिला, लेकिन उन्होंने अन्य सेना अधिकारी को दान कर दिया। परिजनों के मुताबिक एक सैन्य अधिकारी सेवानिवृत्त हो रहे थे।
उनके सम्मान में मेजर मयंक ने अपना शौर्य चक्र उन्हें दे दिया। 14 अगस्त को सेना मेडल की सूची के 30वें नंबर पर मेजर मयंक का नाम एक बार फिर स्वर्णिम अक्षरों से लिखा गया।
