धरती पर पितृ आशीर्वाद देने आ चुके हैं। धार्मिक घाटों पर पितृ कर्म किए जा रहे हैं, लेकिन ये तभी खुश होंगे जब उन्हें आप श्रद्धा भाव से विदाई देंगे। माना जाता है कि यदि पितरों को श्राद्ध समापन के दौरान सही ढंग से विदाई दी जाती है तो वे खुश रहते हैं और उनका आशीर्वाद आप पर हमेशा बना रहेगा। आगे जानें आखिर पूर्वजों को विदा करने की क्या हैं सही विधियां: -
पितृपक्ष 2019: पितरों को खुश करने के लिए इन तरीकों से दें विदाई, हमेशा बना रहेगा आशीर्वाद
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पितृ कार्यों में सर्वोत्तम होता है अमावस्या काल
जब सूर्य चन्द्रमा एक राशि पर हों या एक ही नक्षत्र पर हों तो वह समय अमावस्या काल कहा जाता है। यह काल पितृ कार्यों में सर्वोत्तम होता है। विशेष रूप से जब कन्या राशि में सूर्य-चन्द्रमा की युति होती हो तो उसे अमावस्या श्राद्धपक्ष या अमावस्या अश्विन या अमावस्या कन्यागत कहा जाता है। इस दिन पितृ अपने लोक से चलकर अपने बेटे, पौत्र के घर पर आकर बैठ जाते हैं तथा श्राद्ध काल में श्राद्ध स्थल पर उपस्थित होकर ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में भोजन करते हैं।
फल पुष्प जल से पितरों को करें तृप्त
अश्विन अमावस्या से मध्यान्ह काल में वह दरवाजे पर आकर बैठ जाते हैं। उस दिन यदि श्राद्ध नहीं किया जाता तो वह श्राप देकर लौट जाते हैं। अत: अमावस्या के दिन पत्र, पुष्प, फल, जल तर्पण से यथाशक्ति उनको तृप्त करना चाहिए। श्री बगलामुखी मंदिर के अधिष्ठाता एवं ज्योतिषाचार्य पंडित रोहित वशिष्ठ ने बताया कि श्रद्धा भाव से 28 सितंबर को अमावस्या पर पितृं को विदाई दें। इसके बाद 29 सितंबर से नवरात्र का पूजन शुरू होगा।
ऐसें दें पितरों को विदाई
धरती से पितरों को विदा करने के लिए 28 सितंबर को पितृ अमावस्या के दिन अमावस्या की संध्याकाल में किसी भी नदी किनारे तीस घी की बत्तियां बनाकर किसी भी दोने में रखकर प्रवाहित करें तथा अपने पितृं या पितृ अमावस्या पर करते हुए उन्हें विदाई दें। उनसे अपने परिवार की कुशलक्षेम का आशीर्वाद लें तथा फिर अगले वर्ष आने का निमंत्रण दें।
क्या आपने सार्वजनिक भूमि पर किया है श्राद्ध
हालांकि श्राद्ध पक्ष 28 सितंबर को खत्म हो जाएगा। फिर भी जिनके परिजनों ने अब तक श्राद्ध नहीं किया है, वे एक बात विशेष ध्यान रखें कि श्राद्ध दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि में, कभी नहीं करना चाहिए। जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व ना हो या सार्वजनिक हो उस स्थान पर श्राद्ध किया जा सकता है।