राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का भी काशी से गहरा लगाव था। उन्होंने अपने जीवन काल में काशी की 13 बार यात्राएं की थीं। खादी और चरखे के संस्थागत आंदोलन में काशी विद्यापीठ पहले गांधी आश्रम की स्थापना के साथ ही सक्रिय गतिविधियों का केंद्र बन गया। मानविकी भवन के जिस कक्ष में महात्मा गांधी ठहरे हुए थे। विद्यापीठ प्रशासन ने उस कक्ष को बापू स्मृति दीर्घा के नाम पर विकसित किया है। यहां बापू की स्मृतियां सहेजकर रखी गई हैं। 30 जनवरी को बापू की पुण्यतिथि पर पूरा देश शांति और अहिंसा के पुजारी को नमन कर रहा है।
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महात्मा गांधी
- फोटो : Social Media
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के सेवानिवृत्त प्रो. सतीश राय ने बताया कि महात्मा गांधी की पहली काशी यात्रा तीर्थ यात्री के रूप में हुई। 1903 में तब वह भारतीय राजनीति के लिए अनजान चेहरा थे। काशी का धार्मिक आकर्षण उन्हें यहां तक खींच लाया था। उनकी दूसरी यात्रा तीन फरवरी 1916 को हुई थी। वह चार फरवरी के बीएचयू के स्थापना समारोह में शिरकत करने आए थे। स्थापना समारोह शुरू हो चुका था, महाराजा दरभंगा की अध्यक्षता में कार्यक्रम अपनी रौ में था, तभी एक स्वयंसेवक ने महामना मदन मोहन मालवीय को एक पर्ची दी।
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महात्मा गांधी
- फोटो : फाइल फोटो
इसे देखते ही महामना समारोह स्थल के बाहर की ओर निकल गए। लौटे तो साथ में घुटनों तक धोती, लंबा कुर्ता, कंधे पर झोला और लाठी लिए एक दुबले-पतले व्यक्ति को देख लोगों का कौतूहल बढ़ा। थोड़ी ही देर में लोगों को पता चला कि यह और कोई नहीं, बल्कि मोहन दास करमचंद गांधी हैं। जब वह भाषण देने आए तो शुरुआत ही तीखी थी।
बनारस में बीएचयू की स्थापना के लिए वायसराय के आगमन पर शहर को छावनी में तब्दील कर दिया गया था। तब उन्होंने कहा था कि कोई बम फेंक देता और वायसराय मारे जाते तो क्या ब्रिटिश साम्राज्य नष्ट हो जाता। ऐसे लाखों लोगों को घरों में कैद करना कहां का न्याय है। गांधी ने यहां तक कहा कि एक व्यक्ति की सुरक्षा के लिए पूरे शहर को कैदखाना बना देना पड़े तो उससे बेहतर है कि वह व्यक्ति खुद मर जाए। उनके इस बयान पर एनी बेसेंट ने एतराज जताया तो गांधी का जवाब था कि आपके कहने से मैं चुप नहीं होने वाला। उन्होंने मंडप में बैठे राजा-महाराजाओं पर भी तल्ख टिप्पणी की। उसके बाद सभी ने वॉकआउट कर दिया।
मानविकी संकाय में ठहरे थे बापू
महात्मा गांधी अधिवेशन में शामिल होने 26 जुलाई 1934 को काशी आए थे। 26 जुलाई से दो अगस्त 1934 तक बापू काशी विद्यापीठ के मानविकी संकाय के कक्ष में ठहरे थे। विद्यापीठ प्रशासन ने बापू की याद में इसे स्मारक के रूप में विकसित किया है। इस कक्ष में बापू का चरखा आज भी सुरक्षित रखा हुआ है। अब कोई भी व्यक्ति बापू दीर्घा को देख सकता है। विद्यापीठ की स्थापना के लिए महात्मा गांधी के प्रयास, उनके पत्र, अभिलेखों के साथ ही कई दुर्लभ तस्वीरें भी यहां देखने को मिल जाएंगी।