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UP: एक-दो चैप्टर में बदलाव, हर सेशन में बुक बदल देते हैं स्कूल, 1900 गुना तक महंगी किताबें; जानें क्या है नियम
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
Published by: Arun Parashar
Updated Sun, 22 Mar 2026 05:33 PM IST
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सार
सिलेबस के नाम पर किताबें बदलने का अधिकार स्कूलों के पास नहीं है, अगर कोई स्कूल ऐसा करता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। इसके अलावा किसी भी बोर्ड की ओर से किसी भी विक्रेता को अधिकृत नहीं किया गया है। ऐसे में स्कूल अभिभावकों को किसी एक दुकान से किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।
बुक स्टोर पर अभिभावकों ने किया था प्रदर्शन।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
नया शैक्षणिक सत्र मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए आर्थिक मार की पीड़ा देने वाला बन गया है। निजी स्कूलों की मनमानी और पब्लिशर्स के साथ उनके कथित गठजोड़ ने शिक्षा को एक मुनाफे वाला व्यापार बना दिया है। हालत यह है कि प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें सरकारी (एनसीईआरटी) किताबों की तुलना में 1900 गुना तक महंगी बेची जा रही हैं, जिससे अभिभावकों का बजट पूरी तरह चरमरा गया है।
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स्कूलों की मोनोपॉली, अभिभावकों की मजबूरी
स्कूल किताब-काॅपियों के लिए किसी एक पुस्तक विक्रेता को अधिकृत कर रहे हैं, जो अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर कॉपी और किताबों की बिक्री कर रहे हैं। जबकि पुस्तक विक्रेता अधिकृत न होने पर अभिभावकों के पास अन्य दुकानों का विकल्प खुला होने से उन्हें एमआरपी पर 15 से 20 प्रतिशत तक छूट आसानी से मिल जाती है। अभिभावकों के हंगामे के चलते कई अंग्रेजी माध्यम स्कूलों ने कॉपी किताब की लिस्ट के बजाए पुस्तक विक्रेता की दुकान का पता बता दिया है। जहां स्कूल का नाम और कक्षा बताने पर पहले से तैयार सेट अभिभावकों के हाथ में पकड़ा दिया जाता है। अभिभावक अगर सिर्फ किताब की मांग करें तो भी उन्हें बाद में आना कहकर लौटा दिया जाता है। मजबूरी में अभिभावक पूरी कीमत चुकाकर सेट खरीद रहे हैं।
स्कूल किताब-काॅपियों के लिए किसी एक पुस्तक विक्रेता को अधिकृत कर रहे हैं, जो अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर कॉपी और किताबों की बिक्री कर रहे हैं। जबकि पुस्तक विक्रेता अधिकृत न होने पर अभिभावकों के पास अन्य दुकानों का विकल्प खुला होने से उन्हें एमआरपी पर 15 से 20 प्रतिशत तक छूट आसानी से मिल जाती है। अभिभावकों के हंगामे के चलते कई अंग्रेजी माध्यम स्कूलों ने कॉपी किताब की लिस्ट के बजाए पुस्तक विक्रेता की दुकान का पता बता दिया है। जहां स्कूल का नाम और कक्षा बताने पर पहले से तैयार सेट अभिभावकों के हाथ में पकड़ा दिया जाता है। अभिभावक अगर सिर्फ किताब की मांग करें तो भी उन्हें बाद में आना कहकर लौटा दिया जाता है। मजबूरी में अभिभावक पूरी कीमत चुकाकर सेट खरीद रहे हैं।
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क्या कहते हैं नियम
मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशक माध्यमिक डॉ. मुकेश अग्रवाल बताते हैं कि स्कूलों को सिलेबस में बदलाव का कोई अधिकार नहीं है। पाठ्यक्रम का निर्धारण संबंधित बोर्ड करता है जिसके आधार पर एनसीईआरटी किताबें प्रकाशित करता है। 17 मार्च को एनसीईआरटी की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार सिर्फ कक्षा 9 की किताबों पर काम चल रहा है। ऐसे में सिलेबस के नाम पर किताबें बदलने का अधिकार स्कूलों के पास नहीं है, अगर कोई स्कूल ऐसा करता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा किसी भी बोर्ड की ओर से किसी भी विक्रेता को अधिकृत नहीं किया गया है। ऐसे में स्कूल अभिभावकों को किसी एक दुकान से किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। जनपदस्तरीय कमेटी के माध्यम से जांच कराकर ऐसे विद्यालयों की मान्यता समाप्ति की कार्रवाई की जा सकती है।
मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशक माध्यमिक डॉ. मुकेश अग्रवाल बताते हैं कि स्कूलों को सिलेबस में बदलाव का कोई अधिकार नहीं है। पाठ्यक्रम का निर्धारण संबंधित बोर्ड करता है जिसके आधार पर एनसीईआरटी किताबें प्रकाशित करता है। 17 मार्च को एनसीईआरटी की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार सिर्फ कक्षा 9 की किताबों पर काम चल रहा है। ऐसे में सिलेबस के नाम पर किताबें बदलने का अधिकार स्कूलों के पास नहीं है, अगर कोई स्कूल ऐसा करता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा किसी भी बोर्ड की ओर से किसी भी विक्रेता को अधिकृत नहीं किया गया है। ऐसे में स्कूल अभिभावकों को किसी एक दुकान से किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। जनपदस्तरीय कमेटी के माध्यम से जांच कराकर ऐसे विद्यालयों की मान्यता समाप्ति की कार्रवाई की जा सकती है।
अभिभावकों का संगठन हर साल उठाता है आवाज
स्कूलों की किताबें के दाम में साल दर साल की जा रही वृद्धि और हर साल सिलेबस बदलने के कारण बड़े भाई-बहनों की किताबें रद्दी में जा रही हैं। प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स अवेयरनेस (पापा) संगठन के दीपक सिंह सरीन कहते हैं कि स्कूल संचालक प्रत्येक विषय में एक दो चैप्टर में बदलाव करने के साथ नए प्रकाशकों की किताब लगा देते है। इससे मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो रहा है। सरकार की ओर से हर साल किताबें बदलने पर प्रतिबंध होने के बावजूद स्कूल हर साल किताबें बदल देते हैं।
स्कूलों की किताबें के दाम में साल दर साल की जा रही वृद्धि और हर साल सिलेबस बदलने के कारण बड़े भाई-बहनों की किताबें रद्दी में जा रही हैं। प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स अवेयरनेस (पापा) संगठन के दीपक सिंह सरीन कहते हैं कि स्कूल संचालक प्रत्येक विषय में एक दो चैप्टर में बदलाव करने के साथ नए प्रकाशकों की किताब लगा देते है। इससे मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो रहा है। सरकार की ओर से हर साल किताबें बदलने पर प्रतिबंध होने के बावजूद स्कूल हर साल किताबें बदल देते हैं।
लूट का माध्यम हैं पब्लिशर्स की किताबें
शहर के कॉन्वेंट और निजी स्कूलों ने एनसीईआरटी की सस्ती और प्रामाणिक किताबों को दरकिनार कर भारी-भरकम कमीशन वाली निजी प्रकाशकों की किताबें थोप दी हैं। हमने एनसीईआरटी और प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबों की रेट लिस्ट का अध्ययन किया तो आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
विवरण एनसीईआरटी सेट (कक्षा 6) प्राइवेट पब्लिशर्स सेट (कक्षा 6) प्रतिशत अंतर
किताबों की मूल कीमत 350 रुपये रुपये 7,000 1900 प्रतिशत अधिक
स्टेशनरी (कॉपी सहित) कीमत 800 रुपये रुपये 8,500 962.5 प्रतिशत अधिक
शहर के कॉन्वेंट और निजी स्कूलों ने एनसीईआरटी की सस्ती और प्रामाणिक किताबों को दरकिनार कर भारी-भरकम कमीशन वाली निजी प्रकाशकों की किताबें थोप दी हैं। हमने एनसीईआरटी और प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबों की रेट लिस्ट का अध्ययन किया तो आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
विवरण एनसीईआरटी सेट (कक्षा 6) प्राइवेट पब्लिशर्स सेट (कक्षा 6) प्रतिशत अंतर
किताबों की मूल कीमत 350 रुपये रुपये 7,000 1900 प्रतिशत अधिक
स्टेशनरी (कॉपी सहित) कीमत 800 रुपये रुपये 8,500 962.5 प्रतिशत अधिक
हर साल बढ़ जाते हैं किताबों के सेट के दाम
दो बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं। एक कक्षा 6 में तो दूसरा कक्षा 10 में है। इनकी किताब-कॉपियों के साथ बैग आदि का खर्च मिला लें तो करीब 20 से 25 हजार रुपये अतिरिक्त खर्च हो जाते हैं। अगर किताबें हर साल न बदली जाएं तो बच्चे बड़े भाई-बहन की किताबों से पढ़ाई कर सकते हैं। - हरिओम गोस्वामी, अभिभावक
अभिभावकों पर डाला जा रहा है बोझ
मेरे बेटे और बेटी में चार साल का अंतर है। बेटे की पुरानी किताबें अभी भी मेरे पास हैं। इस बार बेटी की जो किताबें स्कूल ने लगाई हैं वे ठीक उसी पुरानी किताब से मिलती-जुलती हैं। बस चैप्टर को आगे-पीछे कर दिया है। यह अभिभावकों के साथ ज्यादती है। - रिया अग्रवाल, अभिभावक
ये भी पढ़ें-UP: खेत में लोअर-चप्पल और कुएं में मिली लाश, जिस तरह की 11वीं के छात्र की हत्या; कांप गए घरवाले
दो बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं। एक कक्षा 6 में तो दूसरा कक्षा 10 में है। इनकी किताब-कॉपियों के साथ बैग आदि का खर्च मिला लें तो करीब 20 से 25 हजार रुपये अतिरिक्त खर्च हो जाते हैं। अगर किताबें हर साल न बदली जाएं तो बच्चे बड़े भाई-बहन की किताबों से पढ़ाई कर सकते हैं। - हरिओम गोस्वामी, अभिभावक
अभिभावकों पर डाला जा रहा है बोझ
मेरे बेटे और बेटी में चार साल का अंतर है। बेटे की पुरानी किताबें अभी भी मेरे पास हैं। इस बार बेटी की जो किताबें स्कूल ने लगाई हैं वे ठीक उसी पुरानी किताब से मिलती-जुलती हैं। बस चैप्टर को आगे-पीछे कर दिया है। यह अभिभावकों के साथ ज्यादती है। - रिया अग्रवाल, अभिभावक
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