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आपातकाल: नाखून खींचे, जेल में डाल दिए थे बच्चे...इमरजेंसी के वो काले किस्से, जिन्होंने हिला दिया था पूरा देश

अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: Dhirendra Singh Updated Thu, 25 Jun 2026 10:18 AM IST
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सार

25 जून 1975 को लागू आपातकाल के दौरान हजारों लोगों को जेलों में बंद किया गया, विरोध की आवाजों को दबाया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई। उस दौर की यातनाएं और दमन की घटनाएं आज भी लोकतंत्र सेनानियों को सिहरा देती हैं और भारतीय लोकतंत्र के सबसे विवादित अध्याय की याद दिलाती हैं।

Dark Tales of Emergency That Shook the Entire Nation know about 7 unknown facts
21 महीने का आपातकाल - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार

 25 जून, 1975 की रात जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की तो सरकार विरोधी हर शख्स जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया। 21 महीने तक देश में आपातकाल लगा। उस दौर में जेल में बिताई गई हर रात लोकतंत्र रक्षक सेनानियों को अब तक याद है। पुलिस की रूह कंपाने वाली पिटाई और जुल्म के नए-नए तरीकों को झेलने वाले सेनानी अब भी उन्हें याद करके सिहर उठते हैं।

शहर में 150 से ज्यादा लोकतंत्र सेनानी और हजारों लोग ऐसे हैं, जिन्होंने 21 महीने के आपातकाल में यातनाएं सहीं। 12 साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग तक और उनके परिवारों ने आपातकाल में दिए गए जुल्मों को सहन किया। शाहगंज निवासी धनराज कर्मचंदानी उनमें से एक हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े धनराज कर्मचंदानी बताते हैं कि आपातकाल की घोषणा होते ही उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। तब उनकी पत्नी गर्भवती थीं और परिवार में कोई कमाने वाला नहीं था। आपातकाल में जेल में उन पर जुल्म हुए तो सेनानियों ने उनके साथ भूख हड़ताल कर दी। पुलिस की पिटाई के साथ नाखून खींचे जाते थे।
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लोकतंत्र सेनानी विजय गोयल बताते हैं कि उनके साथ उनके छोटे भाई संजय गोयल को पुलिस ने जेल भेजा था। संजय तब सेंट जोंस इंटर कॉलेज के सातवीं के छात्र थे। पुलिस ने उन्हें पकड़ा और डेढ़ महीने जेल में रखा। वह तब 12 साल के सबसे छोटे आंदोलनकारी थे। उन्होंने जेल से ही परीक्षा दी थी।
 
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लोकतंत्र सेनानी और अब विधायक पुरुषोत्तम खंडेलवाल ने बताया कि ताजमहल में चमकी मेले में रात 12 बजे साथियों के साथ लोक संघर्ष पत्रक बांटे। जैसे ही पुलिस को यह पता चला तो लोगों की पिटाई की गई। ताज में इससे भगदड़ मच गई। मैंने इसके बाद राम बरात में भी लोक संघर्ष पत्रक बांटा। जाट हाउस के पास मुझे गिरफ्तार किया। अत्याचार में कांग्रेस ने अंग्रेजों को भी पीछे छोड़ दिया था।

अमर उजाला ने खाली रखा था संपादकीय
अमर उजाला के पुराने पन्नों में दर्ज है कि तत्कालीन सरकार ने आपातकाल में जब प्रेस पर सेंसरशिप और पाबंदियां लगाईं तो अमर उजाला ने अपने संपादकीय की जगह खाली छोड़कर विरोध दर्ज कराया था। आपातकाल के समर्थन में पूरी सरकार के मंत्री जुट गए थे, जो जगह-जगह जाकर आपातकाल की खूबियां गिना रहे थे।
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