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नीट परीक्षा में गड़बड़ी: वन नेशन, वन पेपर की तर्ज पर हों यूजी प्रवेश परीक्षाएं; जानें क्या बोले शिक्षाविद
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Wed, 13 May 2026 12:35 PM IST
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सार
नीट-2026 में गड़बड़ी और परीक्षा रद्द होने के बाद शिक्षाविदों ने देशभर में ‘वन नेशन, वन एग्जाम’ मॉडल लागू करने की मांग उठाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि बोर्ड और प्रवेश परीक्षाओं का सिलेबस समान होने से कोचिंग निर्भरता और पेपर लीक जैसी समस्याएं कम हो सकती हैं।
Neet UG Exam 2026:
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) की ओर से आयोजित नीट-2026 को रद्द किए जाने के फैसले ने एक बार फिर देश के लाखों छात्रों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है। साल 2024 की गड़बड़ियों के बाद गठित समिति के सुझावों को ताक पर रखने का ही नतीजा है कि सुरक्षा के तमाम दावों के बीच सेंधमारी जारी है। शिक्षाविदों का मानना है कि प्रवेश परीक्षा के पैटर्न में आमूलचूल परिवर्तन, स्कूली शिक्षा को प्रभावशाली बनाने और कोचिंग संस्थानों के वर्चस्व को खत्म करने से ही पेपर लीक की समस्या से पार पाया जा सकता है।
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डमी स्कूलों ने बढ़ाया कोचिंग का मकड़जाल
राज्य अध्यापक पुरस्कार प्राप्त शिक्षाविद डॉ. अनिल वशिष्ट के अनुसार सारा खेल कोचिंग संस्थाओं के इर्द-गिर्द घूम रहा है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड इस कॉकस को तोड़ने के लिए प्रयास कर रहा है। सरकार को इसके लिए ठोस कदम उठाने होंगे। प्रतियोगी परीक्षाओं के अलग पैटर्न के कारण बच्चे स्कूल छोड़कर कोचिंग जा रहे हैं, जिससे स्कूली शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह बर्बाद हो रही है। वहीं बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षा का अलग-अलग सिलेबस छात्रों पर मानसिक दबाव डालता है। अक्सर लुभावने विज्ञापनों के जाल में फंसकर छात्र अपनी क्षमता (आईक्यू) जाने बिना मेडिकल-इंजीनियरिंग की दौड़ में शामिल हो रहे हैं, जिससे सिर्फ भीड़ बढ़ रही है। अगर स्कूली स्तर पर ही छात्रों की काउंसिलिंग व्यवस्था हो तो उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार कोर्स चयन में मुश्किल नहीं होगी। इससे नीट, जेईई जैसी परीक्षा की भीड़ भी कम होगी।
राज्य अध्यापक पुरस्कार प्राप्त शिक्षाविद डॉ. अनिल वशिष्ट के अनुसार सारा खेल कोचिंग संस्थाओं के इर्द-गिर्द घूम रहा है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड इस कॉकस को तोड़ने के लिए प्रयास कर रहा है। सरकार को इसके लिए ठोस कदम उठाने होंगे। प्रतियोगी परीक्षाओं के अलग पैटर्न के कारण बच्चे स्कूल छोड़कर कोचिंग जा रहे हैं, जिससे स्कूली शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह बर्बाद हो रही है। वहीं बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षा का अलग-अलग सिलेबस छात्रों पर मानसिक दबाव डालता है। अक्सर लुभावने विज्ञापनों के जाल में फंसकर छात्र अपनी क्षमता (आईक्यू) जाने बिना मेडिकल-इंजीनियरिंग की दौड़ में शामिल हो रहे हैं, जिससे सिर्फ भीड़ बढ़ रही है। अगर स्कूली स्तर पर ही छात्रों की काउंसिलिंग व्यवस्था हो तो उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार कोर्स चयन में मुश्किल नहीं होगी। इससे नीट, जेईई जैसी परीक्षा की भीड़ भी कम होगी।
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तीन पेपर और साझा मेरिट से बन सकती है बात
शिक्षाविद् डॉ. नवीन बलूनी कहते हैं कि स्नातक (अंडर ग्रेजुएट) स्तर पर हर कोर्स के लिए अलग-अलग भटकने के बजाय देशभर के सभी यूजी प्रोग्राम्स के लिए केवल एक प्रवेश परीक्षा होनी चाहिए। इसका सिलेबस अनिवार्य रूप से सिर्फ बारहवीं कक्षा का ही हो। परीक्षा का त्रि-स्तरीय ढांचा विकसित किया जाए जिसमें पहला पेपर बुद्धिमत्ता एप्टीट्यूड, लॉजिक, रीजनिंग और प्रॉब्लम सॉल्विंग का हो, दूसरा भाषाई दक्षता और तीसरा विषय विशेषज्ञता का। जिससे योग्यता के अनुसार छात्रों को प्रवेश दिया जा सके। इसके साथ ही दसवीं के बाद स्कोलास्टिक एप्टीट्यूड टेस्ट (सैट) की तर्ज पर साल में कई बार एप्टीट्यूड टेस्ट होने चाहिए। इससे छात्र को समय रहते पता चल सकेगा कि वह किस क्षेत्र के लिए बना है।
शिक्षाविद् डॉ. नवीन बलूनी कहते हैं कि स्नातक (अंडर ग्रेजुएट) स्तर पर हर कोर्स के लिए अलग-अलग भटकने के बजाय देशभर के सभी यूजी प्रोग्राम्स के लिए केवल एक प्रवेश परीक्षा होनी चाहिए। इसका सिलेबस अनिवार्य रूप से सिर्फ बारहवीं कक्षा का ही हो। परीक्षा का त्रि-स्तरीय ढांचा विकसित किया जाए जिसमें पहला पेपर बुद्धिमत्ता एप्टीट्यूड, लॉजिक, रीजनिंग और प्रॉब्लम सॉल्विंग का हो, दूसरा भाषाई दक्षता और तीसरा विषय विशेषज्ञता का। जिससे योग्यता के अनुसार छात्रों को प्रवेश दिया जा सके। इसके साथ ही दसवीं के बाद स्कोलास्टिक एप्टीट्यूड टेस्ट (सैट) की तर्ज पर साल में कई बार एप्टीट्यूड टेस्ट होने चाहिए। इससे छात्र को समय रहते पता चल सकेगा कि वह किस क्षेत्र के लिए बना है।
कंबाइंड मेरिट बनाई जाए
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करवाने वाले राजीव शर्मा कहते हैं कि केवल प्रवेश परीक्षा नहीं, बल्कि सीयूईटी स्कोर और बोर्ड एग्जाम के अंकों को मिलाकर कंबाइंड मेरिट बनाई जाए। बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षा का सिलेबस एक हो, इससे छात्र स्कूल जाना शुरू करेंगे, कोचिंग संस्थानों पर निर्भरता कम होगी और अभिभावक कोचिंग के बजाए बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित होंगे।
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करवाने वाले राजीव शर्मा कहते हैं कि केवल प्रवेश परीक्षा नहीं, बल्कि सीयूईटी स्कोर और बोर्ड एग्जाम के अंकों को मिलाकर कंबाइंड मेरिट बनाई जाए। बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षा का सिलेबस एक हो, इससे छात्र स्कूल जाना शुरू करेंगे, कोचिंग संस्थानों पर निर्भरता कम होगी और अभिभावक कोचिंग के बजाए बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित होंगे।