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जनसंख्या विस्फोट: सिकुड़ती जमीन और दम तोड़ता शहर, 150 आंकड़ों की हकीकत; हवा-पानी और हरियाली पर संकट

देश दीपक तिवारी, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: Dhirendra Singh Updated Fri, 01 May 2026 11:07 AM IST
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सार

आगरा में 150 वर्षों में जनसंख्या तेजी से बढ़ने से प्रति वर्ग किलोमीटर आबादी का दबाव पांच गुना तक बढ़ गया है। इसका सीधा असर हवा, पानी, हरियाली और बुनियादी ढांचे पर पड़ा है, जिससे पर्यावरणीय संकट गहराता जा रहा है।

Population Explosion in Agra: 150 Years, 5x Pressure on Air Water and Greenery
किनारी बाजार
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विस्तार

आगरा की तस्वीर डेढ़ सदी में पूरी तरह बदल गई है। जिस शहर में कभी इंसान सुकून की खुली हवा में सांस लेता था, आज वहां जनसंख्या विस्फोट के कारण सांसें फूलने लगी हैं। वर्ष 1872 से 2011 के बीच के 150 वर्षों के आंकड़े गवाह हैं कि इंसानों का कुनबा जितनी तेजी से बढ़ा, भौगोलिक दायरा उतना ही सिमटता गया। इन 150 वर्षों में आबादी में 33.24 लाख का भारी-भरकम इजाफा हुआ, जबकि प्रशासनिक पुनर्गठन के कारण जिले के क्षेत्रफल में 898 वर्ग किमी की कमी आई। इसका सीधा असर हमारी जीवनदायिनी संपदा हवा, पानी और हरियाली पर पड़ा है, जिन पर अब पहले के मुकाबले पांच गुना ज्यादा दबाव है।
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रिपोर्ट कार्ड: 1872 बनाम 2011

विवरण जनगणना 1872 जनगणना 2011 बदलाव का स्वरूप
कुल जनसंख्या 10,94,084 44,18,979 + 33.24 लाख
कुल क्षेत्रफल 4,939 वर्ग किमी 4,041 वर्ग किमी - 898 वर्ग किमी
जनसंख्या घनत्व 221 व्यक्ति/वर्ग किमी 1,094 व्यक्ति/वर्ग किमी लगभग 5 गुना बढ़ा दबाव

 
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जब एक किमी के दायरे में रहने लगे 1094 लोग
वर्ष 1872 की जनगणना के दौरान आगरा में प्रति वर्ग किलोमीटर केवल 221 लोग निवास करते थे। तब पर्याप्त जमीन थी, सघन वन क्षेत्र थे और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता थी। लेकिन वर्ष 2011 की जनगणना तक आते-आते यह तस्वीर उलट गई। अब जमीन के उसी टुकड़े पर 1094 लोग रहने को मजबूर हैं। घनत्व में हुई 873 अंकों की इस वृद्धि ने बुनियादी ढांचे और पर्यावरण को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया है।
 

जमीन घटने की पहेली
150 वर्षों के दौरान जिले का क्षेत्रफल 4,939 वर्ग किमी से घटकर 4,041 वर्ग किमी रह जाना मुख्य रूप से प्रशासनिक पुनर्गठन का परिणाम है। नए जिलों (जैसे फिरोजाबाद आदि) के गठन और सीमाओं के पुनर्निर्धारण ने जिले का भौगोलिक नक्शा तो छोटा कर दिया, लेकिन इसी सीमित जमीन पर आबादी का बोझ बढ़ता चला गया।
 

जनसंख्या विस्फोट के साइड इफेक्ट
-हवा और पानी पर आपातकाल: वर्ष 1872 की तुलना में आज प्रति व्यक्ति शुद्ध हवा और पानी की उपलब्धता 80% तक कम हो गई है। भूजल के अत्यधिक दोहन और प्रदूषण ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
-कंक्रीट के जाल में फंसी हरियाली: बढ़ती आबादी की रिहायश के लिए जंगलों और बागों की बलि दी गई। जहां कभी हरियाली की चादर थी, वहां अब कंक्रीट के ऊंचे जंगल (अपार्टमेंट्स) खड़े हैं।-
- दम तोड़ता बुनियादी ढांचा: जो सड़कें और ड्रेनेज सिस्टम कम आबादी के लिए बने थे, वे अब 1094 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी का भार नहीं झेल पा रहे। नतीजा हर दिन ट्रैफिक जाम और जलभराव।
- घटती जोत, बढ़ता संकट: क्षेत्रफल घटने और जनसंख्या बढ़ने से खेती योग्य भूमि छोटी होती जा रही है, जो भविष्य में खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है।

 

सात मई से शुरू होगी नई स्व-गणना
आगामी जनगणना को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। जनगणना प्रभारी शुभांगी शुक्ला ने बताया कि 7 से 21 मई तक स्व-गणना के लिए पोर्टल का लिंक खुलेगा। नागरिक स्वयं अपने मकान और परिवार का विवरण ऑनलाइन भर सकेंगे। गणना के दौरान कुल 33 प्रश्न पूछे जाएंगे, जिनका नागरिकों को सही जवाब देना होगा। 22 मई से 20 जून तक प्रगणक घर-घर जाकर सर्वे करेंगे। इसके लिए 10 हजार प्रगणकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

आंकड़े नहीं, ये गंभीर चेतावनी
जनगणना विश्लेषक डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने बताया कि यह महज आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है। यदि जनसंख्या नियंत्रण और संसाधनों के प्रबंधन पर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में क्वालिटी ऑफ लाइफ का ग्राफ और तेजी से नीचे गिरेगा।
 
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