दवाओं के दलाल: जेएन मेडिकल कॉलेज में मरीजों के पर्चों पर दलालों का कब्जा, ऐसे फंसाते हैं मरीज के तीमारदार को
27 अप्रैल को जेएन मेडिकल कॉलेज में दवाओं के दलालों को लेकर जब पड़ताल की गई तो महेश गौड़ की तरह कई मरीजों के पास बाहरी लोग मिले जो खुद को अस्पताल के बाहर स्थित दवा दुकानों के प्रतिनिधि बता रहे थे। आईसीयू से लेकर सामान्य वार्ड तक इनका आना जाना लगा रहता है।
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मेरी पत्नी को डायलिसिस के लिए हर 15 से 20 दिन में मेडिकल कॉलेज आना पड़ता है। जब हम पहली बार आए तब से लेकर अब तक वही लड़का बाहर खड़ा होता है और हमें वहां दवाएं दे जाता है। हमें बिल कभी उसने दिया नहीं। दवाओं के बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं है। ये जानकारी देते हुए खैर निवासी महेश गौड़ ने कहा कि ओपीडी के अंदर और बाहर दोनों तरफ ये एजेंट घूमते रहते हैं। इन्हें गार्ड्स भी नहीं रोकते हैं और सबसे इनकी पहचान है।
27 अप्रैल को जेएन मेडिकल कॉलेज में दवाओं के दलालों को लेकर जब पड़ताल की गई तो महेश गौड़ की तरह कई मरीजों के पास बाहरी लोग मिले जो खुद को अस्पताल के बाहर स्थित दवा दुकानों के प्रतिनिधि बता रहे थे। सुबह 11.20 से शाम 3.10 बजे तक यह पाया कि कॉलेज परिसर में लगभग हर जगह इन दलालों का नेटवर्क है। आईसीयू से लेकर सामान्य वार्ड तक इनका आना जाना लगा रहता है।
एक डॉक्टर ने पहचान छिपाते हुए यहां तक कहा कि वे खुद इनके खिलाफ कई बार मौखिक शिकायत कर चुके हैं लेकिन कुछ दिन सख्ती के बाद फिर इनका आना शुरू हो जाता है और डॉक्टरों को धमकियां तक देते हैं। मरीजों के साथ इनका लेनदेन नकद में होता है या फिर ये अपने यूपीआई खाते में रुपये लेते हैं। मरीज को दवाओं का बिल भी नहीं देते। ऐसा कोई साक्ष्य नहीं छोड़ते जिससे मरीज कभी शिकायत कर सके। डॉक्टर ने कहा कि यदि किसी दवा से मरीज को दुष्प्रभाव होता है तो उसके पास शिकायत करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं रहता।
यह विषय अभी तक किसी भी स्तर से शिकायत के रूप में सामने नहीं आया है। अगर ऐसा हो रहा है तो यह गलत है। किसी को दवा खरीदने के लिए न तो प्रलोभन दिया जा सकता और न जबरन किया जा सकता है। ग्राहक की मर्जी है, जहां से चाहे दवा खरीदे। मामला गंभीर है। इसमें संज्ञान लेकर मेडिकल कॉलेज प्रशासन से वार्ता कर कार्रवाई तय की जाएगी।-दीपक लोधी, औषधि निरीक्षक
- यह ड्रग अधिनियम का खुला उल्लंघन है। न तो कोई दुकानदार इस तरह एजेंट छोड़ सकता और न कोई किसी को लालच देकर या जबरन करके दवा खरीद के लिए बाध्य कर सकता है। इसकी आड़ में मेडिकल रोड पर नकली दवाएं, सबस्टाइल दवाएं व एथिकल की आड़ में जेनेरिक दवाएं बेचने का धंधा जोरों पर है। दवा की गुणवत्ता व कीमतों के जरिये भी ग्राहक से खिलवाड़ होता है। इस पर सिस्टम को कार्रवाई करनी चाहिए।-शैलेंद्र सिंह टिल्लू, अध्यक्ष कैमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन
इस तरह के मामले में वर्तमान में ताजा शिकायत किसी ने नहीं की है। फिर भी अगर ऐसा हो रहा है तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा। एएमयू प्रॉक्टरोयिल टीम को इस संबंध में अवगत कराकर सुरक्षाकर्मियों की मदद मेडिकल कॉलेज परिसर में ऐसे लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। कार्रवाई भी की जाएगी।-प्रो.अंजुम परवेज, प्राचार्य जेएन मेडिकल कॉलेज
तीन वार्ड में बिस्तरों तक आपूर्ति
ओपीडी के अलावा जब मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन, सर्जरी और हड्डीरोग विभाग के वार्ड का दौरा किया तो पाया कि पाया कि अधिकांश मरीजों को उनके बिस्तर पर ही दवाएं मिल रही हैं। दवाओं के अलावा इम्प्लांट तक इन दलालों के जरिए वहां आ रहे हैं और मरीजों को बिल भी नहीं दिया जा रहा। हाथरस निवासी छवि शर्मा ने बताया कि उनकी बहन का पिछले महीने ऑपरेशन हुआ। उनके पैर में इम्प्लांट डाला गया है। यह किस कंपनी का है और उसकी क्या गुणवत्ता है? ये उन्हें नहीं पता। डॉक्टर ने एक पर्ची पर लिखकर दिया तो वे बाहर आतीं, उससे पहले ही दो लड़के आए और थोड़ी देर में उन्होंने सामान लाकर दे दिया, उसके बाद भुगतान कैश में लेकर चले गए।
पर्चा छीना, फिर कहा- हम सस्ती दवा दिलाएंगे
सोमवार दोपहर इमरजेंसी और ओपीडी के बीच यही नजारा दिखा। अतरौली से पत्नी को दिखाने आए चंद्रपाल जैसे ही बाहर निकले, कुछ युवकों ने उनका पर्चा लेने की कोशिश की। उन्होंने विरोध किया तो कहा गया कि बाहर से सस्ती दवा दिला देंगे। चंद्रपाल ने पर्चा नहीं दिया और परिसर की दुकान से दवा खरीदी। दुबे पड़ाव से बेटे को दिखाने आए गगन अग्रवाल के साथ भी ऐसा ही हुआ। पर्चा मांगने पर विवाद हुआ। मना करने पर युवक आगे बढ़ गए।
करोड़ों का बाजार, निगरानी कमजोर
जिले में करीब 2500 रिटेल और 1200 से अधिक थोक दवा विक्रेता बताए जाते हैं। मेडिकल रोड पर ही 100 से अधिक दवा दुकानें हैं। रोजाना औसतन पांच करोड़ रुपये का दवा कारोबार होता है। ऐसे में मेडिकल कॉलेज के बाहर मरीजों को टारगेट करने वाला यह नेटवर्क दवा बाजार की बड़ी कड़ी बन चुका है।
इतना मिलता है कमीशन
पड़ताल के दौरान एजेंट ललित ने बताया कि वह अलीगढ़ का ही निवासी है और पिछले कई साल से मरीजों को दवाएं दे रहा है। वह अपने इस कार्य को सेवा बताता है, लेकिन जिस दुकान से वह दवाएं लाता है, वहां से एक बिल पर 30% तक कमीशन मिलता है। यह सर्जिकल आइटम्स और इम्प्लांट का है, हालांकि जेनेरिक दवाओं में सबसे कम पांच से आठ फीसदी तक कमीशन मिलता है। हार्ट, किडनी या न्यूरो जैसे सुपर स्पेशिलिटी के अलावा सर्जरी और इमरजेंसी से जुड़े बिल पर कमीशन 20 से 25% तक है।
मरीज क्या करें
- डॉक्टर का पर्चा किसी अनजान व्यक्ति को न दें
- केवल लाइसेंसी मेडिकल स्टोर से दवा लें
- हर दवा का पक्का बिल लें
- दवा के नाम के साथ साल्ट भी जांचें
- संदिग्ध गतिविधि दिखे तो सुरक्षा कर्मियों को सूचना दें

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