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Aligarh: माइक और सायरन के दौर में यहां आज भी सहरी में गूंजता है नगाड़ा, 40 साल से जगा रहे मंजूर अहमद
मो. फहीम, अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़
Published by: Chaman Kumar Sharma
Updated Tue, 10 Mar 2026 04:26 PM IST
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सार
पुराने समय में जब न तो लाउडस्पीकर थे और न ही सायरन, तब मस्जिद में रखा 60 साल पुराना नगाड़ा अलीगढ़ शहर के लोगों को सहरी के लिए जगाने का एकमात्र साधन हुआ करता था। नगाड़े की गूंज दूर-दूर शहर तक सुनाई देती थी।
सहरी में नगाड़ा बजाकर जगाते मंजूर अहमद
- फोटो : संवाद
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विस्तार
अलीगढ़ शहर की ऐतिहासिक ऊपर कोट जामा मस्जिद में रमजान के पाक महीने में सदियों से चली आ रही नगाड़ा बजाने की परंपरा आज भी जीवित है। आज भी लोग नगाड़े की आवाज सुनकर सहरी में उठते हैं।
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आधुनिक दौर में जहां माइक और सायरन से सहरी के लिए रोजेदार को जगाने की व्यवस्था हो चुकी है, वहीं जामा मस्जिद में परंपरा के तौर रमजान का चांद देखकर आज भी नगाड़ा बजाया जाता है। पुराने समय में जब न तो लाउडस्पीकर थे और न ही सायरन, तब मस्जिद में रखा 60 साल पुराना नगाड़ा अलीगढ़ शहर के लोगों को सहरी के लिए जगाने का एकमात्र साधन हुआ करता था। नगाड़े की गूंज दूर-दूर शहर तक सुनाई देती थी। लोग इसी आवाज से जागकर रोजा रखने की तैयारी करते थे।
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इस परंपरा को पिछले 40 वर्षों से भुजपुरा निवासी 60 वर्षीय मंजूर अहमद निभा रहे है। उन्होंने बताया कि वह 20 वर्ष की उम्र से नगाड़ा बजा रहे हैं। उनसे पहले उनके मामू हमीद यह जिम्मेदारी निभाते थे। मंजूर कहते हैं कि नगाड़ा बजाना सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि सवाब का जरिया है। रोजेदारों की मदद कर उन्हें सहरी में जगाना सुकून देता है। उन्होंने कहा कि जब तक उनके हाथ-पांव में जान है, वह इस परंपरा को जारी रखेंगे।
मस्जिद कमेटी की ओर से उन्हें इसके लिए रमजान में 3500 रुपये मानदेय दिया जाता है। लोग भी आर्थिक सहयोग कर देते हैं, जिससे उनके परिवार की ईद खुशी-खुशी मन जाती है। सैर सैयद नगर कॉलोनी निवासी इजलाल अहमद ने बताया कि काफी वर्ष पहले की बात है, जब हवा का रुख बदलता, तो आवाज सुनाई देती थी। हम सोचते थे कि ऊपर कोट जामा मस्जिद से सर सैयद नगर काफी दूर है, लेकिन रात के सन्नाटे में सहरी के वक्त आवाज आती थी।
