Research: डांट-अपमान और अनदेखी, बोलते नहीं, पर टूट जाता है किशोरवस्था में ही मनोबल
एएमयू के मनोविज्ञान विभाग में 13 से 17 वर्ष की आयु के 335 किशोरों पर भावनात्मक शोषण के प्रभावों पर पांच साल तक अध्ययन किया। इसमें चिंताजनक पहलू यह सामने आया है कि भावनात्मक शोषण न केवल किशोरों की आत्म-धारणा को प्रभावित करता है, बल्कि उनके समायोजन और लचीलापन को भी गंभीर रूप से कमजोर कर देता है।
विस्तार
डांट, अपमान, अनदेखी और डर से किशोरवस्था में ही बच्चों का आत्मविश्वास व मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है। वह बोलते नहीं लेकिन इसके घाव बहुत गहरे हैं। भीतर से यह उन्हें खोखला कर देता है। यह खुलासा एएमयू के मनोविज्ञान विभाग में हुए एक अध्ययन हुआ है। घर और स्कूल जैसे सुरक्षित माहौल में किशोर भावनात्मक शोषण के शिकार हो रहे हैं।
13 से 17 वर्ष की आयु के 335 किशोरों पर भावनात्मक शोषण के प्रभावों पर पांच साल तक अध्ययन किया। इसमें चिंताजनक पहलू यह सामने आया है कि भावनात्मक शोषण न केवल किशोरों की आत्म-धारणा को प्रभावित करता है, बल्कि उनके समायोजन और लचीलापन को भी गंभीर रूप से कमजोर कर देता है।
विभाग के अध्यक्ष प्रो. शाह आलम के निर्देशन में आफरीन के अध्ययन में किशोरियों में इस तरह के मामले किशोरों की तुलना में अधिक पाए गए। अस्वीकृति, डराने-धमकाने, अलगाव जैसे आयाम में किशोरों को अनदेखा करने की समस्या अधिक देखी गई।
किशोरियों में भावनात्मक शोषण के मामले किशारों की तुलना में अधिक पाए गए, खासकर अस्वीकृति, डराने-धमकाने, अलगाव और भ्रष्ट करने जैसे आयामों में। किशोराें में अनदेखा किए जाने की समस्या अधिक देखी गई। आत्म-धारणा के स्तर पर किशोरों में नैतिकता मजबूत पाई गई, जबकि किशोरियों में बौद्धिक आत्म-धारणा अधिक बेहतर रही।
भावनात्मक शोषण एक गंभीर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्या है, जिसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। किशोरों के स्वस्थ भविष्य के लिए इस मुद्दे पर तत्काल ध्यान और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। संवाद से ही समस्याओं का समाधान हो सकता है।-प्रो. शाह आलम, अध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, एएमयू
ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा मामले
अध्ययन में यह भी सामने आया कि ग्रामीण क्षेत्रों के किशोरों में भावनात्मक शोषण के मामले शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक हैं। हालांकि, शहरी किशोरों में सामाजिक, शैक्षिक और नैतिक आत्म-धारणा अधिक मजबूत पाई गई। दोनों क्षेत्रों में समायोजन और लचीलापन के स्तर में खास अंतर नहीं देखा गया। सामाजिक मान्यताएं, पारिवारिक ढांचा, लैंगिक भेदभाव और सांस्कृतिक धारणाएं भावनात्मक शोषण को बढ़ावा देती हैं। कई मामलों में बच्चे अपने ही परिवार में इस शोषण का सामना करते हैं, लेकिन डर और शर्म के कारण इसे व्यक्त नहीं कर पाते।
शिक्षकों और अभिभावकों का व्यवहार भी डालता है नकारात्मक प्रभाव
अध्ययन में यह भी सामने आया कि शिक्षकों द्वारा अपमान, तुलना, पक्षपात जैसे व्यवहार भी किशोरों पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। इसे दूर करने के लिए स्कूलों में भावनात्मक साक्षरता और स्वस्थ संवाद को बढ़ावा देने की जरूरत बताई है।
सरकार और समाज के लिए सुझाव
भावनात्मक शोषण को रोकने के लिए जागरूकता अभियान, काउंसलिंग सेवाएं, स्कूल-आधारित कार्यक्रम और सख्त नीतियां लागू की जाएं। अभिभावकों को प्रशिक्षित करने और किशोरों के लिए सुरक्षित माहौल बनाने पर जोर दिया गया है।
ये दिए गए सुझाव
-माता-पिता और शिक्षकों को जागरूक करना
-काउंसिलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देना
-स्कूलों में भावनात्मक शिक्षा लागू करना
-ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष जागरूकता अभियान चलाना
-डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी खतरा, इस संबंध में जागरूक करना
ये हैं शोषण
-शारीरिक शोषण
-यौन शोषण
-मौखिक शोषण
-धार्मिक शोषण
-भावनात्मक शोषण
क्या है भावनात्मक शोषण
-अस्वीकृति
-आतंकित
-पृथक
-शोषण-भ्रष्टाचार
-नजरअंदाज
-डर पैदा करने वाला
-परेशान
-अपमानजनक
-ठुकराना
