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Aligarh News: मांझे से कटी उड़ान, ममता भी नहीं बचा सकी चील की जान
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चाइनीज मांझे ने एक और उड़ान छीन ली। रेलवे कॉलोनी स्थित मनोरंजन सदन पार्क में घायल होकर जमीन पर आ गिरी एक चील ने दूसरे दिन दम तोड़ दिया। इस कहानी में सबसे मार्मिक पहलू एक बच्ची की जिद का रहा जिसने घायल चील को बचाने के लिए हर मुमकिन प्रयास किया लेकिन आखिर में वह हार गई।
बीते रविवार को जब घायल चील जमीन पर गिरी, तो उसे देखकर राशि शर्मा का दिल पसीज गया। अपने पिता हितेंद्र कुमार के साथ वह उसे अपने घर ले आई। छोटे-छोटे हाथों से उसने उसके जख्मों पर दवा लगाई, उसे सहलाया, पानी पिलाने की कोशिश की और घंटों उसके पास बैठी रही। मदद के लिए उसने चिकित्सक को भी घर बुलाया। हर बार जब चील हल्की सी हरकत करती, राशि की आंखों में उम्मीद चमक उठती, लेकिन जख्म गहरे थे। दो दिन तक चले इस संघर्ष के बाद मंगलवार को चील ने दम तोड़ दिया। यह देख राशि खुद को रोक नहीं पाई और फफक कर रो पड़ी मानों उसका कोई अपना उससे छिन गया हो। एक तरफ कातिल मांझा, दूसरी तरफ एक बच्ची का मासूम स्नेह, लेकिन इस बार जीत इंसानियत की नहीं, लापरवाही की हुई।
भावुक पिता हितेंद्र कुमार ने यहां तक कहा कि यह केवल एक पक्षी की मौत नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं की सामूहिक हत्या है। घटना की जानकारी वन विभाग को समय रहते दी गई लेकिन मदद के हाथ समय पर नहीं पहुंचे। यदि विभाग सक्रियता दिखाता और सही उपचार समय पर मिल जाता, तो शायद वह चील आज फिर से आसमान में उड़ रही होती। यह सोचकर हैरानी होती है कि मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होने वाला वह एक धागा किसी के जीवन का आखिरी बंधन बन जाएगा।
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बीते रविवार को जब घायल चील जमीन पर गिरी, तो उसे देखकर राशि शर्मा का दिल पसीज गया। अपने पिता हितेंद्र कुमार के साथ वह उसे अपने घर ले आई। छोटे-छोटे हाथों से उसने उसके जख्मों पर दवा लगाई, उसे सहलाया, पानी पिलाने की कोशिश की और घंटों उसके पास बैठी रही। मदद के लिए उसने चिकित्सक को भी घर बुलाया। हर बार जब चील हल्की सी हरकत करती, राशि की आंखों में उम्मीद चमक उठती, लेकिन जख्म गहरे थे। दो दिन तक चले इस संघर्ष के बाद मंगलवार को चील ने दम तोड़ दिया। यह देख राशि खुद को रोक नहीं पाई और फफक कर रो पड़ी मानों उसका कोई अपना उससे छिन गया हो। एक तरफ कातिल मांझा, दूसरी तरफ एक बच्ची का मासूम स्नेह, लेकिन इस बार जीत इंसानियत की नहीं, लापरवाही की हुई।
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भावुक पिता हितेंद्र कुमार ने यहां तक कहा कि यह केवल एक पक्षी की मौत नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं की सामूहिक हत्या है। घटना की जानकारी वन विभाग को समय रहते दी गई लेकिन मदद के हाथ समय पर नहीं पहुंचे। यदि विभाग सक्रियता दिखाता और सही उपचार समय पर मिल जाता, तो शायद वह चील आज फिर से आसमान में उड़ रही होती। यह सोचकर हैरानी होती है कि मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होने वाला वह एक धागा किसी के जीवन का आखिरी बंधन बन जाएगा।