Malaria: उत्तर प्रदेश में घटा मलेरिया, जेनेटिक म्यूटेशन से बदले मच्छर, हो रहे हैं अधिक ताकतवर
मच्छर अंडे और लार्वा की अवस्था में गंदे पानी, रसायनों और विषैले वातावरण में भी जीवित रहकर खुद को परिस्थितियों के अनुरूप ढाल लेते हैं। घातक रसायनों और कीटनाशकों की वजह मच्छर 8 से 10 घंटे में ही ताकतवर हो रहे हैं।
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मलेरिया को लेकर अलीगढ़ सहित पूरे उत्तर प्रदेश में नए संक्रमित मरीजों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। इसके चलते राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश कैटेगरी दो से निकल कैटेगरी एक में पहुंच गया है, जिसका मतलब यह है कि यहां एक हजार की आबादी पर एक से भी कम मलेरिया मरीज मिल रहे हैं। हालांकि, दूसरी ओर वैज्ञानिकों ने मच्छरों के बदलते व्यवहार को लेकर नई चेतावनी दी है। इनके अनुसार मच्छरों में तेजी से जेनेटिक म्यूटेशन हो रहा है, जिससे उनमें कीटनाशकों और रसायनों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है। यही कारण है कि बाजार में उपलब्ध कई उत्पादों का असर पहले जैसा नहीं रह गया है।
मच्छरों पर अध्ययन करने वाले शीर्ष संस्थानों में से एक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के जंतु विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने बताया कि मच्छर अंडे और लार्वा की अवस्था में गंदे पानी, रसायनों और विषैले वातावरण में भी जीवित रहकर खुद को परिस्थितियों के अनुरूप ढाल लेते हैं। घातक रसायनों और कीटनाशकों की वजह मच्छर 8 से 10 घंटे में ही ताकतवर हो रहे हैं। बाद में यही मच्छर वयस्क होने पर सामान्य कीटनाशकों से कम प्रभावित होते हैं।
एएमयू के जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. शाहिद बिन जिया ने बताया कि मच्छरों के शरीर में ऐसे एंजाइम बनने लगते हैं, जो जहरीले रसायनों को निष्क्रिय कर देते हैं। कुछ शोधों में एसएपी2 नामक प्रोटीन की भूमिका भी सामने आई है, जो उन्हें सीधे संपर्क वाले कीटनाशकों से बचाता है। इन रसायनों के बीच पलने वाले लार्वा धीरे-धीरे इनके आदी हो जाते हैं। यदि किसी मादा मच्छर ने 300 से 350 अंडे दिए, तो उनमें बड़ी संख्या ऐसे अंडों की होती है जिनमें प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी होती है। यही आगे चलकर नई पीढ़ी में मच्छरों की संख्या बढ़ाते हैं।
मच्छरों को मारने के लिए जिन नए रसायनों का प्रयोग हो रहा है, उसी के अनुरूप वे (मच्छर) जेनेटिक परिवर्तनों के जरिए अधिक ताकतवर हो रहे हैं। उनकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है और वे हर तरह की परिस्थितियों में पनप रहे हैं।- प्रो. शाहिद बिन जिया, जंतु विज्ञान विभाग, एएमयू
प्रदेश ने ऐसे सुधारी स्थिति
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार प्रदेश में बीते वर्षों में मलेरिया जांच शिविर, घर-घर सर्वे, समय पर दवा वितरण, फॉगिंग, लार्वा नियंत्रण और जागरूकता अभियानों का असर दिखा है। ग्रामीण क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था मजबूत होने से इन मामलों में कमी आई है। नई दिल्ली के राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम की रिपोर्ट बताती है कि साल 2021 में प्रदेश में 42.45 लाख नमूनों की जांच में 1464 मरीज संक्रमित मिले।
2022 में 503, 2023 में 1305, 2024 में 998 और 2025 में 649 मरीज सामने आए। बदायूं, बरेली, शाहजहांपुर, सीतापुर, खीरी (लखीमपुर), लखनऊ, पीलीभीत और सोनभद्र के अलावा कानपुर नगर, संभल, गौतमबुद्ध नगर, बाराबांकी, औरैया, रामपुर, बुलंदशहर, मिर्जापुर, मेरठ, प्रयागराज और गोरखपुर जिले पर सबसे अधिक फोकस है। आगरा और अलीगढ़ सहित 12 जिलों में मलेरिया का बहुत कम असर है।
एक मच्छर से लाखों तक पहुंच सकती है संख्या
मादा मच्छर का जीवन चक्र लगभग छह सप्ताह का होता है। इस अवधि में वह तीन से पांच बार अंडे देती है। हर तीन-चार दिन में खून चूसने के बाद वह अंडे देती है। एक बार में करीब 300 से 350 अंडे देती है। इनमें बड़ी संख्या जीवित बच जाती है और तेजी से नई पीढ़ी तैयार होती है। अनुकूल परिस्थितियों में कुछ ही समय में इनकी संख्या लाखों तक पहुंच सकती है।

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