UP : इलाहाबाद हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी- योग्यता व प्रशासनिक क्षमता किसी जाति की बपौती नहीं, यह है पूरा मामला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकारी धन से संचालित सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों का प्रबंधन किसी एक जाति, परिवार या गुट की जागीर नहीं बन सकता। क्योंकि योग्यता और प्रशासनिक क्षमता किसी की बपौती नहीं है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकारी धन से संचालित सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों का प्रबंधन किसी एक जाति, परिवार या गुट की जागीर नहीं बन सकता। क्योंकि योग्यता और प्रशासनिक क्षमता किसी की बपौती नहीं है। इस तल्ख टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने फतेहपुर के धाता इंटर कॉलेज की प्रबंधन समिति के चुनाव से जुड़े विवाद की सुनवाई करते हुए प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव (बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा) और रजिस्ट्रार फर्म्स, सोसाइटी एवं चिट्स से व्यक्तिगत हलफनामा तलब किया है। पूछा गया है कि सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं को एक जाति, परिवार व गुट विशेष से मुक्त कराने के लिए सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम और यूपी इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम कौन-कौन से संशोधन की आवश्यकता है।
क्या है मामला
मामला कॉलेज की प्रबंध समिति के वर्षों से लंबित चुनाव के विवाद से जुड़ा है। याचिका में जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) के उस पत्र को चुनौती दी गई थी जिसमें कॉलेज की प्रबंधन समिति का चुनाव कराने के निर्देश दिए गए थे। याची ने दलील दी कि पुरानी प्रबंधन समिति का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। इसलिए वह चुनाव कराने की अधिकारी नहीं है। लिहाजा, चुनाव उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम की धारा 16-डी के तहत अधिकृत नियंत्रक नियुक्त कर कराया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि इस संस्थान को लेकर एक दशक से अधिक समय से लगातार मुकदमेबाजी चल रही है। दोनों गुटों के बीच मुकदमेबाजी का यह पांचवां दौर है। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के विवादों का सीधा असर विद्यालय के प्रधानाचार्य, शिक्षकों और विद्यार्थियों पर पड़ता है, जबकि संस्थान का अधिकांश खर्च राज्य सरकार वहन करती है। फिलहाल, कोर्ट ने डीआईओएस के 20 जून के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत धाता इंटर कॉलेज की प्रबंधन समिति का चुनाव कराने का निर्देश दिया गया था। मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर 2026 को होगी।
जातीय वर्चस्व का सर्वे कर सुझाव दे सरकार
कोर्ट ने सरकार से प्रदेशभर में ऐसे सभी सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों और उन्हें संचालित करने वाली सोसाइटी के सर्वे का निर्देश दिया है जिन पर एक ही जाति के लोगों का प्रभुत्व है। साथ ही सुझाव भी मांगा है कि इन संस्थाओं के प्रबंधन में शिक्षाविदों, न्यायविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, उद्योगपतियों, चार्टर्ड अकाउंटेंट, मान्यता प्राप्त पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को, जाति से परे, शामिल करने की व्यवस्था की जा सकती है या नहीं। कोर्ट ने इस कार्य में जिला विद्यालय निरीक्षक को स्थानीय थाना प्रभारी और तहसीलदार की सहायता लेने को कहा गया है, जबकि जिलाधिकारी और एसएसपी को सहयोग सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
सामाजिक विशेषज्ञों और शिक्षाविदों से आगे शोधपत्र
मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं से भी इस विषय पर अपने सुझाव और शोधपत्र उपलब्ध कराने को कहा है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसने अभी किसी मुद्दे पर अंतिम राय नहीं बनाई है। विशेषज्ञों से प्राप्त सामग्री केवल न्यायिक सहायता के लिए होगी।