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बीमा देने से पहले स्वास्थ्य जांच की जिम्मेदारी कंपनी की : उपभोक्ता आयोग
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जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने कहा कि बीमा पॉलिसी जारी करने से पहले बीमाधारक के स्वास्थ्य की जांच करना बीमा कंपनी की जिम्मेदारी है। बाद में मेडिकल हिस्ट्री का हवाला देकर बीमा क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता। आयोग ने हृदय रोग के इलाज का खर्च नहीं देने को बीमा कंपनी की सेवा में कमी मानी।
आयोग ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि निर्णय की तारीख से दो माह में 93,814 रुपये पर परिवाद दाखिल करने की तारीख से भुगतान तक आठ प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्याज समेत रकम अदा करे। यह आदेश अध्यक्ष मोहम्मद इब्राहीम, सदस्य प्रकाश चंद्र त्रिपाठी और सदस्य सरला की पीठ ने शिव कुमार यादव की ओर से दाखिल परिवाद पर दिया।
मेजा क्षेत्र निवासी शिव कुमार यादव ने एक बैंक के माध्यम से 30 जून 2016 से 29 जून 2017 तक पांच लाख रुपये की हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ली थी। आरोप लगाया था कि 14 नवंबर 2016 को हृदय संबंधी बीमारी होने पर उसे लखनऊ स्थित डॉ.राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में भर्ती कराया गया। 15 नवंबर को भर्ती और 16 नवंबर को डिस्चार्ज होने के बाद इलाज व जांच में खर्च हुई रकम के भुगतान के लिए बीमा कंपनी में क्लेम किया गया। लेकिन बीमा राशि का भुगतान नहीं किया गया।
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बीमा कंपनी की ओर से दलील दी गई कि याची को पहले से एंजाइना की शिकायत थी। वह पॉलिसी शुरू होने के छह माह के भीतर अस्पताल में भर्ती हुआ था। कंपनी के मुताबिक जरूरी मेडिकल दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने पर चार जून 2018 को क्लेम खारिज कर दिया गया।
आयोग ने कहा कि बीमा पॉलिसी जारी करने से पहले कंपनी को बीमाधारक के स्वास्थ्य की पूरी जांच कर संतुष्ट होना चाहिए। इलाज के बाद मेडिकल हिस्ट्री का पता लगाकर क्लेम से इन्कार करना सही नहीं है।
आयोग ने बीमा कंपनी को राशि ब्याज सहित देने का आदेश दिया। साथ ही 10 हजार रुपये आर्थिक व मानसिक क्षतिपूर्ति और पांच हजार रुपये वाद व्यय भी देने का आदेश दिया।
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आयोग ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि निर्णय की तारीख से दो माह में 93,814 रुपये पर परिवाद दाखिल करने की तारीख से भुगतान तक आठ प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्याज समेत रकम अदा करे। यह आदेश अध्यक्ष मोहम्मद इब्राहीम, सदस्य प्रकाश चंद्र त्रिपाठी और सदस्य सरला की पीठ ने शिव कुमार यादव की ओर से दाखिल परिवाद पर दिया।
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मेजा क्षेत्र निवासी शिव कुमार यादव ने एक बैंक के माध्यम से 30 जून 2016 से 29 जून 2017 तक पांच लाख रुपये की हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ली थी। आरोप लगाया था कि 14 नवंबर 2016 को हृदय संबंधी बीमारी होने पर उसे लखनऊ स्थित डॉ.राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में भर्ती कराया गया। 15 नवंबर को भर्ती और 16 नवंबर को डिस्चार्ज होने के बाद इलाज व जांच में खर्च हुई रकम के भुगतान के लिए बीमा कंपनी में क्लेम किया गया। लेकिन बीमा राशि का भुगतान नहीं किया गया।
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बीमा कंपनी की ओर से दलील दी गई कि याची को पहले से एंजाइना की शिकायत थी। वह पॉलिसी शुरू होने के छह माह के भीतर अस्पताल में भर्ती हुआ था। कंपनी के मुताबिक जरूरी मेडिकल दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने पर चार जून 2018 को क्लेम खारिज कर दिया गया।
आयोग ने कहा कि बीमा पॉलिसी जारी करने से पहले कंपनी को बीमाधारक के स्वास्थ्य की पूरी जांच कर संतुष्ट होना चाहिए। इलाज के बाद मेडिकल हिस्ट्री का पता लगाकर क्लेम से इन्कार करना सही नहीं है।
आयोग ने बीमा कंपनी को राशि ब्याज सहित देने का आदेश दिया। साथ ही 10 हजार रुपये आर्थिक व मानसिक क्षतिपूर्ति और पांच हजार रुपये वाद व्यय भी देने का आदेश दिया।