High Court : इंसान की औलाद है इंसान बनेगा, बाल गृह के अभिलेख से हटेगा बच्चों का जाति-धर्म
Allahabad High Court News : बच्चों के मन से जाति-पाति और धार्मिक भेदभाव मिटाने के उद्देश्य से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाल सुधार गृह में बच्चों के नाम के आगे से जाति हटाने का आदेश जारी किया था। जिस पर यूपी सरकार ने इस पर सभी बाल गृहों को आदेश जारी कर बच्चों के आगे से जाति धर्म हटाने का फरमान जारी किया है।
विस्तार
तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा। 1959 में फिल्म धूल का फूल के लिए मोहम्मद रफी का गाया यह गीत अब उत्तर प्रदेश के बाल सुधार गृहों में हकीकत बनने जा रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी फटकार के बाद प्रदेश सरकार ने बाल गृहों के सरकारी अभिलेख से बच्चों की जाति और धर्म का जिक्र हटाने का आदेश जारी कर दिया है। केंद्र सरकार किशोर न्याय अधिनियम में आवश्यक संशोधन की सिफारिश की है, ताकि यह व्यवस्था पूरे देश में लागू की जा सके।
यह जानकारी राज्य सरकार के अधिवक्ता ने न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ को प्रयागराज की एक नाबालिग पीड़िता की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान दी है। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया राजकीय बाल गृहों के रिकॉर्ड में अभी भी बच्चों की जाति और धर्म का उल्लेख किया जा रहा है। जबकि, इससे पहले कोर्ट ने इटावा के प्रवीण छेत्री के मामले में भी एफआईआर और आपराधिक दस्तावेज में आरोपियों की जाति का अनावश्यक उल्लेख नहीं करने के विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए थे।
कोर्ट ने अपने फैसले में डॉ.भीमराव आंबेडकर के दर्शन का जिक्र किया था। कहा था की डॉ.आंबेडकर के सपनों के भारत में जाति राष्ट्र-विरोधी है। क्योंकि, यह अलगाव पैदा करती है। हमें 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है तो इसकी शुरुआत बच्चों के मन से भेदभाव मिटाकर करनी होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना किसी ठोस कानूनी आधार के बच्चों की जाति दर्ज करना उनकी गरिमा और संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। बच्चों को बचपन में ही किसी संकीर्ण पहचान में बांधने के बजाय उन्हें केवल एक इंसान और भारतीय नागरिक के रूप में देखा जाना चाहिए।
अब भाई की कस्टडी में है पीड़िता
सुनवाई के अंत में अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि पीड़िता (नाबालिग बहन) अब अपने भाई की सुरक्षित कस्टडी में है। इस पर संतोष जताते हुए कोर्ट ने याचिका को निस्तारित कर दी।