High Court : यूपी का निवासी होने मात्र से नहीं मिलता सुनवाई का अधिकार, फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नई दिल्ली स्थित सशस्त्र बल न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पोषणीयता के आधार पर खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूपी का निवासी होने मात्र से याची को दूसरे राज्य के मामलों की सुनवाई का अधिकार इलाहाबाद हाईकोर्ट में नहीं मिल जाता।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नई दिल्ली स्थित सशस्त्र बल न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पोषणीयता के आधार पर खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूपी का निवासी होने मात्र से याची को दूसरे राज्य के मामलों की सुनवाई का अधिकार इलाहाबाद हाईकोर्ट में नहीं मिल जाता। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने अलीगढ़ निवासी सचिन कुमार व तीन अन्य की ओर से सेवा समाप्ति के आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका पर दिया है। कोर्ट ने याचियों को उचित क्षेत्राधिकार वाली अदालत के समक्ष याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता प्रदान की है।
याची सशस्त्र सेना में विभिन्न पदों पर तैनात थे। उन्हें शैक्षणिक आधार पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। बर्खास्तगी आदेश को उन्होंने दिल्ली स्थित सशस्त्र बल न्यायाधिकरण प्रधान पीठ में चुनौती दी थी, जहां से उनकी अर्जी खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के अधिवक्ता ने क्षेत्राधिकार के आधार पर आपत्ति उठाई। कहा कि आलोच्य आदेश दिल्ली स्थित न्यायाधिकरण का है। इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट को इसकी सुनवाई का अधिकार नहीं है। हालांकि, याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि आदेश भले ही दिल्ली का है, लेकिन याची यूपी के मूल निवासी हैं। इसलिए इन्हें इलाहाबाद में याचिका दाखिल करने का अधिकार है।
कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम अलापन बंद्योपाध्याय और एल चंद्र कुमार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए याची की दलीलें खारिज कर दीं। स्पष्ट किया कि अनुच्छेद-226(2) के तहत केवल तथ्यों के समूह के आधार पर अधिकार क्षेत्र तय नहीं होगा। किसी भी न्यायाधिकरण के फैसले की समीक्षा वही हाईकोर्ट करेगा, जिसके भौगोलिक क्षेत्र में वह न्यायाधिकरण स्थित है।
टिप्पणी
यदि अलग-अलग राज्यों के निवासी एक ही केंद्रीय आदेश को अपने-अपने राज्यों के हाईकोर्ट में चुनौती देंगे तो इससे कानूनी अनिश्चितता और परस्पर विरोधी निर्णयों की स्थिति पैदा होगी। इससे बचने के लिए एक न्यायाधिकरण, एक उच्च न्यायालय का पालन अनिवार्य है। - इलाहाबाद हाईकोर्ट
एकपक्षीय फैसले के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका पोषणीय नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण मामल में परिवार न्यायालय के एकपक्षीय आदेश के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका को पोषणीय नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि प्रभावित पक्ष को सबसे पहले उसी अदालत में जाना होगा, जिसने आदेश पारित किया है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की एकल पीठ ने देवरिया के अभिषेक की ओर से पत्नी और बच्चों के पक्ष में परिवार न्यायालय के दिए एकपक्षीय फैसले के खिलाफ दाखिल पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। हालांकि, याची को संबंधित न्यायालय में उचित आवेदन देने की स्वतंत्रता प्रदान की है।