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High Court : तबादले के खिलाफ दिए गए अभ्यावेदन को बिना कारण बताए खारिज करने का आदेश रद्द

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 12 Apr 2026 07:38 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि स्थानांतरण नीति के तहत दिए गए वैधानिक अभ्यावेदन पर संबंधित प्राधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह उस पर विचार करे और अपना निर्णय गुणों के आधार पर दे। सिर्फ खारिज लिख देने से यह प्रतीत होता है कि प्राधिकारी ने निर्णय लेते समय अपने विवेक का उचित प्रयोग नहीं किया है।

High Court: Order rejecting representation against transfer without assigning any reason is quashed
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि स्थानांतरण नीति के तहत दिए गए वैधानिक अभ्यावेदन पर संबंधित प्राधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह उस पर विचार करे और अपना निर्णय गुणों के आधार पर दे। सिर्फ खारिज लिख देने से यह प्रतीत होता है कि प्राधिकारी ने निर्णय लेते समय अपने विवेक का उचित प्रयोग नहीं किया है। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने सीआरपीएफ जवान का मथुरा से जम्मू और कश्मीर किया गया स्थानांतरण रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकलपीठ ने माता प्रसाद सिंह की याचिका पर दिया है।

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याची का 22 दिसंबर 2025 को जारी आदेश से तबादला मथुरा की 16वीं बटालियन से उधमपुर, जम्मू-कश्मीर की 137वीं बटालियन में कर दिया गया था। इस स्थानांतरण के विरुद्ध याची ने स्थानांतरण नीति के पैरा-12 के अंतर्गत एक वैधानिक अभ्यावेदन प्रस्तुत किया था। हालांकि, संबंधित प्राधिकारी ने इस अभ्यावेदन को 10 फरवरी 2026 को बिना कोई विस्तृत कारण बताए खारिज कर दिया था। याची ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी।
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याची अधिवक्ता मलिक जुनेद अहमद ने दलील दी कि याची के प्रत्यावेदन पर नियमों को अनदेखा आदेश पारित किया गया है। विवादित आदेश को रद्द किया जाना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी की ओर से दी गई जानकारी में कहा गया है कि स्थानांतरण सेवा का एक हिस्सा है और किसी भी कर्मचारी को मनचाही जगह पर तैनाती का कोई निहित अधिकार नहीं है। हालांकि वैधानिक अभ्यावेदन की स्थिति में सक्षम अधिकारी का यह कानूनी दायित्व है कि वह एक तर्कसंगत और सकारण आदेश पारित करे। न्यायालय ने संतोष कुमार पाल बनाम भारत संघ के मामले में पूर्व में दिए गए कानूनी सिद्धांतों का भी संदर्भ लिया।

अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए प्रतिवादी संबंधित अधिकारी के 10 फरवरी 2026 को पारित किए गए पुराने आदेश को रद्द कर दिया है। साथ ही, न्यायालय ने संबंधित प्राधिकारी को आदेश दिया है कि वे याची के अभ्यावेदन पर कानून के अनुसार और पूर्व में स्थापित न्यायिक निर्णयों को ध्यान में रखते हुए दो सप्ताह के भीतर एक नया और विस्तृत आदेश जारी करें।

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