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High Court : लंबित मुकदमा व दोषियों की ढलती उम्र संगीन जुर्म से राहत का आधार नहीं, उम्रकैद की सजा बरकरार

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 22 Mar 2026 03:19 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दीवार बनाने के विवाद में 41 साल पहले बरेली में हुए खूनी संघर्ष के दो दोषियों की उम्रकैद पर अपनी मुहर लगा दी। वहीं, सजा पाए अन्य सात की मुकदमा लंबित रहने के दौरान मौत होने से उनकी अपील अपास्त कर दी गई।

High Court: Pending trial and advancing age of convicts are not grounds for relief from serious crimes
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दीवार बनाने के विवाद में 41 साल पहले बरेली में हुए खूनी संघर्ष के दो दोषियों की उम्रकैद पर अपनी मुहर लगा दी। वहीं, सजा पाए अन्य सात की मुकदमा लंबित रहने के दौरान मौत होने से उनकी अपील अपास्त कर दी गई। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपील का दशकों तक लंबित रहना या दोषियों की ढलती उम्र, हत्या जैसे संगीन जुर्म में राहत का आधार नहीं बन सकती।

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मामला बरेली के नवाबगंज थाना क्षेत्र का है। 14 जून 1981 को बाबू खान ने अपने घर के पास शौचालय की दीवार उठाई थी। उसे पड़ोसी बाज खान गिराना चाहता था। इस बात को लेकर विवाद खूनी जंग में तब्दील हो गया। दीवार गिराने से मना करने पर नौ लोग लाठी-डंडों, भालों और कांता (धारदार हथियार) से लैस होकर आए और राजगीर का काम कर रहे लोगों पर टूट पड़े। हमले में साबिर खान की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि कल्लू खान और लियाकत गंभीर रूप से घायल हुए।
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चार साल चले ट्रायल के बाद बरेली की सत्र अदालत ने 1985 में महताब खान, बुंदन खान, दाराब खान उर्फ भूरे खान, बाज खान, इजराइल खान, मंगल खान, मेहराब खान, ताज खान और बाले खान को उम्रकैद की सजा सुनाई। सजा के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे नौ दोषियों में इजरायल खान और बाले खान को छोड़ कर बाकी सभी की मुकदमे के दौरान मौत हो गई। जीवित बचे इजरायल और बाले खान के अधिवक्ता ने दलील दी कि वे 40 साल से जमानत पर हैं और अब बूढ़े हो चुके हैं। हालांकि, कोर्ट ने उनकी दलील को सिरे से खारिज कर दिया। साथ ही पुलिस को आदेश दिया है कि दोनों को तत्काल हिरासत में लेकर जेल भेजा जाए, ताकि वे अपनी शेष उम्रकैद की सजा काट सकें। 

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