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Kargil Vijay Diwas : कारगिल शहीद के नाम तालाब में भूमि का पट्टा, सड़क के लिए 24 साल से सिर्फ सर्वे

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 26 Jul 2024 02:23 PM IST
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सार

फतेहपुर के शुकुलपुर गांव में पैदा हुए हवलदार कंचन सिंह हल्द्वानी रेजीमेंट की ओर से वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान साथी सैनिकों को खाद्य एवं रसद पहुंचाने के लिए तैनात किए गए थे। उसी दौरान दुश्मन सेना की ओर से किए गए मोर्टार हमले में वह शहीद हो गए थे।

Kargil Vijay Diwas: Land lease in the pond in the name of Kargil martyr, only survey for road for 24 years
शहीद हवलदार कंचन सिंह। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

कारगिल युद्ध में शहीद हुए हवलदार कंचन सिंह के नाम पर उनके गांव में शहादत के 24 साल बाद भी सड़क नहीं बन सकी। सड़क के लिए हर दो वर्ष पर सिर्फ सर्वे ही होता आया है। शहीद की पत्नी के नाम पांच बीघा कृषि योग्य भूमि का पट्टा भी तालाब में कर दिया गया। वहां जोतकोड़ संभव नहीं है। यह दावा शहीद की पत्नी कुसुमा देवी ने बृहस्पतिवार को किया। उन्होंने तालाब में किया गया पट्टा निरस्त कर दूसरी जगह भूमि आवंटित करने के लिए डीएम को पत्र दिया है।

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फतेहपुर के शुकुलपुर गांव में पैदा हुए हवलदार कंचन सिंह हल्द्वानी रेजीमेंट की ओर से वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान साथी सैनिकों को खाद्य एवं रसद पहुंचाने के लिए तैनात किए गए थे। उसी दौरान दुश्मन सेना की ओर से किए गए मोर्टार हमले में वह शहीद हो गए थे। उनके इकलौते पुत्र प्रतीक कुमार सिंह भारत हैवी इलेक्ट्रिकल में सीनियर इंजीनियर के पद पर तैनात हैं। जबकि, पुत्री रीता अब इस दुनिया में नहीं रहीं।
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पोंगहट के पास घर बनवाकर रहने वाली हवलदार कंचन सिंह की पत्नी कुसुमा बताती हैं कि पति की शहादत के बाद सम्मान पत्र के अलावा अभी तक उन्हें सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं मिला है। तब सरकार ने परिवार के एक सदस्य को नौकरी, पेट्रोल पंप, मकान और जमीन देने की घोषणा की थी।


कुसुमा बताती हैं कि पढ़ी लिखी न होने के कारण उन्हें नौकरी नहीं मिली। पेट्रोल पंप भी आवंटित नहीं किया गया। पेट्रोल पंप का आवेदन आठवीं पास न होने का कारण बताते हुए निरस्त कर दिया गया। आश्रित परिवार को गुजारे के लिए पांच बीघा कृषि योग्य भूमि आवंटित की जानी थी। भूमि का पट्टा तो किया गया, लेकिन वह तालाब में कर दिया गया, जहां जोतकोड़ नहीं की जा सकती।

गांव वाले तालाब की भूमि होने की वजह से इसे निरस्त हो जाने की बात करते हैं। वह बताती हैं कि बीती जनवरी को उन्होंने डीएम फतेहपुर से मिलकर तालाब का पट्टा निरस्त कर दूसरी जगह भूमि आवंटित करने का आग्रह किया। डीएम ने उनका आवेदन ले लिया है, लेकिन अभी तक कुछ हुआ नहीं है।

हल्द्वानी चलने के लिए भेजी थी चिट्ठी, बाद में आई शहादत की खबर

कुसुमा देवी शहीद पति की यादों में अब भी खोई रहती हैं। सात अगस्त, 1999 की तारीख याद करके वह फफक पड़ती हैं, जब तिरंगे में लिपटा पति का शव घर लाया गया था। कुसुमा बताती हैं कि उसके कुछ दिन पहले ही हल्द्वानी चलने के लिए पति ने तैयार रहने को पत्र भेजा था। पत्र मिलने के बाद बच्चों के साथ हल्द्वानी में शिफ्ट होने की तैयारियां भी शुरू हो गई थीं, लेकिन उनकी शहादत की खबर के साथ ही सारे सपने चूर हो गए।
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