Mahakumbh 2025: महिला नागा साधु बनने की उम्र क्या होती है और महाकुंभ के बाद की इनकी यात्रा कैसी?
नागा साधुओं की रहस्य की दुनिया और उनसे भी ज्यादा रहस्यमयी महिला नागा साधु की दुनिया। नागिन, अवधूतनी और माई के नामों से इनको पहचाना जाता है। सभी के मन में आता है कि अगर पुरुष नागा साधुओं की तपस्या इतनी कठिन होती है तो महिला नागा साधुओं के लिए तो यह और भी मुश्किल भरा सफर रहता होगा। इसके साथ ही यह सवाल भी मन में उठता है कि क्या महिला नागा साधु बनने की कोई उम्र होती है? कुंभ के बाद इनका अगला पढ़ाव कहां ?
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सांसारिक जीवन से पूरी तरह दूर। ब्रह्मचर्य का पालन और दीक्षा के बाद बदला हुआ नाम मतलब खुद को भूलकर प्रभु के चरणों में समर्पित। खुद का पिंडदान पहले ही कर चुकी होती हैं, इन्हें सिर्फ गेरुए को धारण करने की अनुमति। माथे पर तिलक लगाना अनिवार्य। इसके बारे में और जानने और इनसे जुड़े तथ्यों को समझने के लिए महंत वैभव गिरि से संपर्क किया गया।
पहले तो यह जानना चाहा कि क्या महिला नागा साधु बनने की भी कोई उम्र होती है। इस पर उनका कहना था वैसे तो अध्यात्मक का अनुभव और भगवान को समझने की कोई उम्र नहीं होती है। प्रहलाद ने भी भक्ति दिखाई क्या उस बच्चे की कोई उम्र थी जो अपने पिता की बात न मानकर भक्ति में लीन हो गया और होलिका भी उसका दहन नहीं कर सकी। इसलिए यह कहना कि भक्ति को समझने के लिए कोई उम्र है सही नहीं है। हां, इस बात का ध्यान रखा जाता है कि उनका यह निर्णय बहुत सोच समझ के लिया गया हो। इसलिए वयस्क होने के बाद ही महिला को नागा बनने की प्रक्रिया से गुजारा जाता है।
जरूरी नहीं जितनी महिलाएं नागा बनने की इच्छा रखती हैं उन सभी का चुनाव कर लिया जाए। इसके लिए पहले कई वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है और जब उनके गुरु को इस बात का अहसास हो जाता है कि यह नागा बनने की योग्यता रखती है तो उन्हें यह उपाधि दी जाती है। यह सामाजिक जीवन से पूरी तरह से कट चुकी होती है और महाकुंभ जैसे अवसरों पर ही आपको ये देखने को मिलती है। आपको यह भी बता दें कि महिला नागा साधु वस्त्र धारण करती हैं।
इस संबंध में उनसे अगला सवाल किया गया कि नागा साधु तो महाकुंभ के बाद वैभव और वैराग्य में से किसी एक रास्ते का चयन कर लेते हैं तो महिला साधु के लिए कोई अलग रास्ता होता है। उनका कहना था नहीं महिला साधु को भी इन्हीं दो रास्तों में से एक का चयन करना होता है। ऐसी स्थिति में या तो वो किसी मंदिर या पीठ से जुड़ जाती हैं या फिर उन्हें भी वैराग्य का रास्ता ही चुनना होता है।