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Prayagraj : कभी माघ मेले की आर्थिक लहरों से तर होती थी पब्लिक लाइब्रेरी, धर्म-कर्म तक सीमित नहीं रहा स्वरूप

शशांक वर्मा, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 23 Jan 2026 04:29 PM IST
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सार

माघ मेले का स्वरूप कभी धर्म-कर्म तक ही सीमित नहीं रहा। यह सर्व कल्याण का मेला रहा है। 1895 से 1925 तक माघ मेले के लिए जो बजट जारी होता था, उससे कंपनी गार्डन स्थिति पब्लिक लाइब्रेरी का भी संचालन होता था।

Public libraries were once buoyed by the economic surge of the Magh Mela
राजकीय पब्लिक लाइब्रेरी। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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माघ मेले का स्वरूप कभी धर्म-कर्म तक ही सीमित नहीं रहा। यह सर्व कल्याण का मेला रहा है। 1895 से 1925 तक माघ मेले के लिए जो बजट जारी होता था, उससे कंपनी गार्डन स्थिति पब्लिक लाइब्रेरी का भी संचालन होता था। आज भी माघ मेला हजारों लोगों की आर्थिक तरक्की में मददगार है।

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मध्यकालीन गॉथिक शैली में निर्मित पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना 1863-64 में गवर्नमेंट प्रेस में हुई थी। 1879 में भवन बनकर तैयार हुआ तो लाइब्रेरी यहां शिफ्ट हो गई थी। शुरुआती दिनों में अंग्रेज अफसरों ने इसमें दिलचस्पी दिखाई, लेकिन बाद के दिनों में इसके संचालन के लिए अलग से फंड मिलना मुश्किल हो गया। डॉ.भुवनेश्वर सिंह गहलौत ने अपनी पुस्तक इलाहाबाद : वे दिन, वे लोग में इस बात का जिक्र किया है कि अंग्रेजी सरकार ने माघ मेले के फंड का कुछ हिस्सा इस लाइब्रेरी के संचालन पर खर्च किया।
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हालांकि, चार मार्च 1923 को इस लाइब्रेरी को शासन संरक्षित संस्था घोषित कर दिया गया। इसके प्रबंधन में बदलाव कर 26 लोगों की कमेटी बनाई गई, लेकिन माघ मेले के कोष का पैसा इस पर खर्च किया जाता रहा। इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने इसे देश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तकालय बताया। तेज बहादुर सप्रू, डॉ.अमरनाथ झा, सर सैयद वजीर हसन, न्यायमूर्ति ओएस मूथम, प्रो.सतीश चंद्र देव, ओपी भटनागर, एससी देसाई और न्यायमूर्ति कमलाकांत वर्मा जैसे प्रतिष्ठित लोग प्रबंध समिति के सदस्य रहे।

पूर्व पीएम शास्त्री ने इसे सरस्वती नदी कहा

वर्तमान में पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ.गोपाल मोहन शुक्ल बताते हैं कि लाइब्रेरी की स्थापना के 100 वर्ष पूरा होने पर समारोह हुआ तो उसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री आए थे। शास्त्री जी ने अपने भाषण में कहा था कि वह विदेश जाते हैं और संगम की बात होती है तो लोग पूछते हैं कि सरस्वती नदी तो दिखती नहीं। तब उन्होंने कहा कि यह लाइब्रेरी ही सरस्वती का स्वरूप है। शास्त्री जी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और स्टेट पब्लिक लाइब्रेरी को दूसरी त्रिवेणी कहा था।

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