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Holi : क्रूरता का अंत करने वाले गांव रंग नहीं तिलक लगाकर मनाते हैं होली, वर्षों पहले हुई घटना बन गई परंपरा

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 02 Mar 2026 01:43 PM IST
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सार

दक्षिणी कोटवा, जमुनीपुर, बेलवार एवं सोतापुर में आज भी होली विजय पर्व के रूप में मनाई जाती है। ग्रामीणों के अनुसार 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में होली के दिन इन गांवों में कर वसूली की क्रूर प्रथा का अंत हुआ था।

village that put an end to cruelty celebrates Holi by applying tilak instead of colors
सन 1977 में विजय पर्व की फाइल फोटो 2. सन 1977 में विजय पर्व की फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

दक्षिणी कोटवा, जमुनीपुर, बेलवार एवं सोतापुर में आज भी होली विजय पर्व के रूप में मनाई जाती है। ग्रामीणों के अनुसार 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में होली के दिन इन गांवों में कर वसूली की क्रूर प्रथा का अंत हुआ था। तब से यहां त्योहार मनाने की एक अलग परंपरा पड़ गई। लोग एक-दूसरे पर रंग नहीं डालते, माथे पर अबीर का तिलक लगाते हैं।

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बताते हैं कि अवध के नबाब के शासन काल में गांवों में किसानों से कर वसूलने के लिए एक ताल्लुकेदार तैनात किया गया था, जो बहुत ही क्रूर था। समय से कर नहीं देने वालों पर तरह-तरह से अत्याचार कर मौत के घाट उतार देता था। इतना ही नहीं, विवाह होने पर गांव आने वाली दुल्हन की डोली भी गढ़ी में उठवा लेता था। ककरा गांव स्थित महर्षि दुर्वासा आश्रम के निकट उसकी गढ़ी थी। उसकी सुरक्षा के लिए सैनिकों के साथ तोपें भी लगाई गई थीं।
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तत्कालीन राजपूत ठाकुर अमान सिंह का विवाह होने पर ताल्लुकेदार ने उन्हें बंदी बना लिया था। डोली उठवाने के लिए सैनिकों को भेजा तो दुल्हन जमुनीपुर गांव में सती हो गईं थी। इससे ग्रामीणों का स्वाभिमान जाग उठा। उन्होंने जमुनीपुर गांव के ठाकुर नजर सिंह, बाबा माधव दास गिरी के नेतृत्व में योजनाबद्ध तरीके से होली के दिन उसकी गढ़ी पर हमला कर ताल्लुकेदार को मौत के घाट उतार गढ़ी ध्वस्त कर दी थी।

जमुनीपुर गांव निवासी पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एवं नेहरू ग्राम भारती विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलाधिपति पंडित जेएन मिश्र बताते हैं कि आज भी कहीं रहें, होली पर गांव जरूर आते हैं। सोतापुर निवासी सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी विजय कृष्ण तिवारी कहते हैं कि एक घटना हमारी परंपरा बन गई है। दक्षिणी कोटवा गांव के ठाकुर उपेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. मृदुल सिंह राणा बताते हैं कि यह परंपरा हमारे पूर्वजों से जुड़ी है। इससे हम लोगों में विशेष उत्साह रहता है। संवाद

ताल्लुकेदार की गढ़ी पर होता है विरोध प्रदर्शन

ग्रामीण हर वर्ष होली पर सुबह नए कपड़े पहन एक-दूसरे के मस्तक पर अबीर का तिलक लगाते हैं। अलग अलग दलों में शामिल हो नक्कारों और ढोल की थाप पर तलवार, लाठी, भाला एवं फरसा जैसे पारंपरिक शस्त्रों का प्रदर्शन कर महर्षि दुर्वासा ऋषि का दर्शन-पूजन करते हैं। इसके बाद ताल्लुकेदार की गढ़ी स्थल पर विरोध प्रदर्शन करते हैं। शाम को सती मैया के चौरा और मां ऐंद्री देवी के दर्शन-पूजन के साथ विजय पर्व संपन्न हो जाता है।

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