Emergency: जहां बंद थे भविष्य के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री, नैनी जेल में रखे गए थे करीब 700 राजनीतिक बंदी
25 जून 1975 की आधी रात देश के लोकतांत्रिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय शुरू हुआ, जिसे लोग आपातकाल के नाम से याद करते हैं। उस रात देशभर में हजारों विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं को गिरफ्तार किया गया था।
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25 जून 1975 की आधी रात देश के लोकतांत्रिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय शुरू हुआ, जिसे लोग आपातकाल के नाम से याद करते हैं। उस रात देशभर में हजारों विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं को गिरफ्तार किया गया था। उन्हीं में एक थे इविवि के 25 वर्षीय एलएलबी छात्र व तत्कालीन संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) के युवा नेता केके श्रीवास्तव। इन्हें 30 जून 1975 की रात घर से पुलिस ने उठाकर जेल भेज दिया। केके श्रीवास्तव बताते हैं कि नैनी सेंट्रल जेल का सर्किल-तीन राजनीतिक बंदियों का बड़ा केंद्र बन गई थी। यहां करीब 700 राजनीतिक बंदियों को रखा गया था। इन्हीं में आज के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी, प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव और पूर्व केंद्रीय मंत्री जनेश्वर मिश्र शामिल थे।
जेल में तीन मेस चलती थीं। एक का संचालन इविवि के तत्कालीन प्रोफेसर डॉ. मुरली मनोहर जोशी करते थे। दूसरी की जिम्मेदारी इविवि के तत्कालीन प्रोफेसर डॉ. सत्यव्रत सिन्हा और बाबा रामधारी यादव के पास थी। तीसरी मेस की व्यवस्था युवा कार्यकर्ता संभालते थे। दिन में भोजन और चर्चाओं के बाद शाम को जेल परिसर खेल के मैदान में बदल जाता था। कोई कबड्डी खेलता, कोई वॉलीबॉल, कोई शतरंज और कोई ताश। राजनाथ सिंह और जनेश्वर मिश्र अक्सर बैडमिंटन खेलते दिखाई देते थे, जबकि डॉ. मुरली मनोहर जोशी और राम नरेश यादव ताश और शतरंज में समय बिताते थे।
शाम छह बजे लग जाता था ताला, लाउडस्पीकर से मिलती थी दुनिया की खबर
समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश मुख्यालय के निर्वाचन प्रमुख श्रीवास्तव कहते हैं कि शाम छह बजे गिनती के बाद बैरकों में ताला बंद हो जाता था। बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग खत्म था। समाचार सुनने का एकमात्र साधन था जेल परिसर में लगा एक लाउडस्पीकर, जो जेल अधीक्षक के कमरे में रखे रेडियो से जुड़ा था। शाम सात और रात आठ बजे सभी बंदी उसी लाउडस्पीकर के नीचे खड़े होकर समाचार सुनते थे। जेल में उस समय का अखबार ‘भारत’ आता था, लेकिन अखबारों और प्रसारण माध्यमों पर सेंसरशिप लागू थी। दूरदर्शन पर लगातार इंदिरा गांधी की तस्वीरों और एकपक्षीय खबरों का प्रसारण होता था।
एक चिट्ठी की इजाजत, रिश्तेदारों से मिलने पर रोक
श्रीवास्तव बताते हैं कि जेल की सबसे बड़ी यातना शारीरिक नहीं, मानसिक थी। 19 महीनों तक कोई रिश्तेदार या परिचित उनसे मिलने नहीं आ सका। महीने में केवल एक पत्र मिलने की अनुमति थी और वह भी जेल प्रशासन की जांच के बाद। यदि किसी पत्र में प्रशासन को आपत्तिजनक सामग्री लगती, तो उस हिस्से पर स्याही फेर दी जाती थी।
प्रोफेसर पर बिजली का तार काटने का आरोप
केके श्रीवास्तव ने बताया कि जेल में इविवि के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रघुवंश भी थे। पोलियो के कारण उनका हाथ और पैर प्रभावित था। वे अंगूठे में कलम फंसाकर लिखते थे। बावजूद इसके उन पर बिजली के खंभे पर चढ़कर तार काटने का आरोप लगाया गया था।
जेल से बाहर निकलना लगा दूसरा जन्म
उन्होंने बताया कि सात जनवरी 1977 को राजनीतिक बंदियों की रिहाई शुरू हुई। 19 महीने बाद जब जेल के दरवाजे खुले, तो उन्हें ऐसा लगा जैसे नया जीवन मिल गया हो। इसके कुछ ही महीनों बाद हुए आम चुनाव में इंदिरा गांधी और कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा तथा मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी।
लोकतंत्र की कीमत का एहसास
आपातकाल के उस दौर को याद करते हुए श्रीवास्तव कहते हैं कि जेल में बंद हर व्यक्ति लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्व समझ गया था। आज जब वे पीछे मुड़कर देखते हैं तो उन्हें सिर्फ अपनी गिरफ्तारी नहीं, बल्कि वह पूरा दौर याद आता है, जब एक पूरी पीढ़ी ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी आजादी दांव पर लगा दी थी।
अखबार तो दूर, चिट्ठी लिखने की भी नहीं थी इजाजत
आपातकाल के दिनों की यादें साझा करते एजी ब्रदरहुड कर्मचारी संघ के पूर्व अध्यक्ष कृपाशंकर श्रीवास्तव बताते हैं कि जेल में अखबार नहीं मिलता था। परिवार को चिट्ठी लिखने तक की इजाजत नहीं थी। घर-परिवार और देश दुनिया के खबरों से दूर जेल में लगभग दो साल बिताए।
25 जून 1975 की रात करीब तीन बजे रामबाग स्थित उनके आवास पर तत्कालीन पुलिस कप्तान मैनेजर पांडेय एक ट्रक पीएसी के जवानों को लेकर पहुंचे थे। पूरी गली को छावनी में तब्दील कर दिया गया था। मुझे गिरफ्तार करके कोतवाली ले जाया गया, जहां डॉ. मुरली मनोहर जोशी, जनेश्वर मिश्र, बाबा राम आधार यादव और सत्य प्रकाश मालवीय पहले से मौजूद थे।
रात भर वहां रखने के बाद अगले दिन सभी लोगों को नैनी जेल के जवाहरलाल नेहरू बैरक में बंद कर दिया गया। दोपहर में राजनाथ सिंह और मुलायम सिंह यादव को भी लाया गया। चार महीने बाद उन्हें भोपाल केंद्रीय जेल भेज दिया गया, जहां अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी, चंद्रशेखर मौजूद थे।