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UP: बाराबंकी से गए मूसवी के पौत्र बने थे ईरान के पहले सुप्रीम लीडर, खामेनेई के सत्ता संभालने की कहानी

श्रुतिमान शुक्ल, अमर उजाला, बाराबंकी Published by: Sharukh Khan Updated Mon, 02 Mar 2026 08:30 AM IST
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सार

बाराबंकी से गए मूसवी के पौत्र ईरान के पहले सुप्रीम लीडर बने थे। अमेरिका-इस्राइल के हमले में मारे गए अयातुल्ला अली खामेनेई इन्हीं के शागिर्द थे। ईरानी शासक की मौत से किंतूर गांव शोक में डूबा नजर आया।

Grandson of Moosavi who hailed from Barabanki became first Supreme Leader of Iran ayatollah ali khamenei
बाराबंकी से ईरान का कनेक्शन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

इस्राइल और अमेरिका के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। इस बीच बाराबंकी का किंतूर गांव शोक में डूबा नजर आया। 
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गांव वालों का गमजदा होना लाजिमी भी है, क्योंकि क्योंकि 196 साल पहले किंतूर गांव से ईरान गए सैयद अहमद मूसवी के पोते रूहुल्लाह खुमैनी ने ही ईरान की सत्ता व सियासत की दिशा बदल दी थी। हमले में मारे गए ईरान के शासक अयातुल्ला अली खामेनेई उन्हीं खुमैनी के शागिर्द थे।
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किंतूर गांव पहुंची संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने देखा कि लोग अमेरिका को कोस रहे थे। गांव के बाहर एक दुकान पर पांच छह लोग चर्चा कर रहे थे कि अमेरिका व इस्राइल ने ईरान पर 1200 से ज्यादा बम गिराए हैं। 

इन हमलों में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के साथ उनकी बेटी-दामाद, बहू और पोती की मौत हो गई है। लोग कहने से नहीं चूके कि रूहुल्लाह खुमैनी होते तो वह जरूर कुछ ऐसा करते जिससे अमेरिका के दांत खट्टे हो जाते।
 

गांव के अंदर पहुंचने पर आदिल काजमी अपने घर पर मिले। उन्होंने बताया कि करीब आठ पीढ़ी पहले गांव के सैयद अहमद मूसवी जियारत करने ईरान गए थे। वह वहां शिया समुदाय के रहबर बनकर रहने लगे। इन्हीं मूसवी के पोते रूहुल्लाह खुमैनी ने अपने संघर्ष से ईरान की सत्ता बदली। अब हमले में मारे गए सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई हमारे किंतूर के वंशज रूहुल्लाह खुमैनी के शिष्य थे। इनका हमारा खून का कोई रिश्ता नहीं है।

1830 में हुआ बाराबंकी से ईरान का कनेक्शन
बाराबंकी के सिरौलीगौसपुर तहसील क्षेत्र के किंतूर गांव में वर्ष 1790 में सैयद अहमद मूसवी का जन्म हुआ था। मूसवी सन 1830 में 40 वर्ष की उम्र में ईरान गए और खुमैन नामक गांव में बस गए। अपने वतन हिन्दुस्तान से उनको इतना लगाव था कि उन्होंने अपने नाम के आगे हिंदवी जोड़ा और वह अहमद मूसवी हिंदवी के नाम से पहचाने जाने लगे।

उनके पुत्र सैयद मुस्तफा हुए और 1902 में मुस्तफा के बेटे रूहुल्लाह खुमैनी हुए। उस समय ईरान पर पहलवी वंश का शासन था। खुमैनी ने इसका विरोध किया। उनके बढ़ते प्रभाव से घबराकर सरकार ने उन्हें देश से निष्कासित कर दिया, लेकिन ईरान की जनता खुमैनी के समर्थन में सड़कों पर उतर आई। हालात इतने बिगड़े कि शासक को ईरान छोड़कर भागना पड़ा।

करीब 14 साल के निर्वासन के बाद खुमैनी की ईरान वापसी हुई। वर्ष 1979 में ईरान में पहली बार इस्लामी सरकार बनी और रूहुल्लाह खुमैनी देश के पहले सुप्रीम लीडर घोषित किए गए। इसी क्रांति ने ईरान को राजशाही से मजहबी शासन की ओर मोड़ दिया। 1989 में रूहुल्लाह खुमैनी के निधन के बाद उनके शागिर्द अयातुल्ला अली खामेनेई ने सत्ता की बागडोर संभाली।

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