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ग्राउंड रिपोर्ट: इस लोकसभा सीट पर बसपा मैदान से बाहर, दलित-मुस्लिम वोटरों के रुख पर टिकी जीत

शशांक मिश्र, बरेली ब्यूरो Published by: मुकेश कुमार Updated Sun, 05 May 2024 12:53 PM IST
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सार

बरेली लोकसभा सीट पर रोमांचक मुकाबला होने के आसार हैं। इस बार बसपा पहले ही चुनावी मैदान से बाहर हो चुकी है। इससे यहां भाजपा और सपा के बीच सीधी टक्कर मानी जा रही है। इसका फैसला सात मई को होगा। यहां की जनता का क्या मूड है। जानिए इस ग्राउंड रिपोर्ट में... 

Victory depends on Dalit-Muslim voters in Bareilly Lok Sabha Seat
सपा प्रत्याशी प्रवीण सिंह ऐरन, भाजपा के छत्रपाल सिंह गंगवार - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

रात के 10 बजे हैं। आला हजरत दरगाह की गली में कलाम गूंज रहे हैं। मोहल्ला सौदागरान में जियारत चल रही है। इसके बीच सियासी चर्चाएं भी जारी हैं...। यह माहौल बता देता है कि बरेली में चुनावी माहौल कैसा है। मुसलमान किसी तरह की गफलत में नहीं है। भाजपा के गढ़ में अपने वोट से देश को संदेश देने की बात कर रहे हैं। सवाल पर शबीबुल्लाह दबी जुबान में कहते हैं, देश में सांप्रदायिक सौहार्द नहीं बचा है। शबीबुल्लाह को यहां बदलाव की उम्मीद है। 

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बसपा के मैदान से बाहर होने के बाद भाजपा और सपा के बीच यहां सीधी जंग है। यही नहीं धीरे-धीरे तस्वीर भी साफ हो चली है। बसपा प्रत्याशी का नामांकन खारिज होने के बाद पार्टी के आधार वोटबैंक पर दोनों दलों की नजर है। यही कारण है कि करीब डेढ़ लाख मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।
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मत प्रतिशत तय करेगा जीत का आधार
बरेली कॉलेज के राजनीति शास्त्र विभाग की प्रो. वंदना शर्मा का मानना है कि संतोष गंगवार का टिकट कटने से गंगवार मतदाताओं में जो नाराजगी थी, भाजपा ने गंगवार उम्मीदवार मैदान में उतार कर उसे खत्म कर दिया। वहीं, बसपा के गंगवार उम्मीदवार का पर्चा खारिज होने से यहां गंगवार मतों के बंटवारों की आशंका भी खत्म हो गई है।

शहर के प्रमुख कारोबारी मनु ढींगरा कहते हैं कि शुरू में संतोष गंगवार का पर्चा कटने को लेकर बहुत नाराजगी थी, लेकिन अब लगता है कि कोई नाराजगी नहीं है। पिछले 10 वर्ष के बदलाव और प्रदेश में सुरक्षित माहौल को ही हमने मुद्दा बनाया है।

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काशी धर्मपुर के बसपा कार्यकर्ता हरिश कुमार अपने उम्मीदवार का नामांकन खारिज होने पर कहते हैं, इतने चुनाव हुए अभी तक हमारे उम्मीदवार का पर्चा रद्द नहीं हुआ, लेकिन इस बार रद्द करवा दिया। हमारे वोट के अधिकार पर चोट हुई है। इसका जवाब हम देंगे।

आला हजरत दरगाह के पास दुकानदार जुनौद कहते हैं कि इस बार चुनाव में कोई शोर नहीं है, महंगाई, बेरोजगारी है लेकिन ये भी मुद्दे नहीं हैं।

चुनावी समर के योद्धा
छत्रपाल गंगवार, भाजपा
बहेड़ी विधानसभा सीट से दो बार विधायक और पेशे से शिक्षक रहे हैं। अपनी जीत के लिए मोदी की गारंटी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि पर निर्भर हैं। बसपा ने भी यहां से गंगवार प्रत्याशी मैदान में उतारा था, जिससे यहां चुनावी मुकाबला दिलचस्प हो गया था, पर पर्चा खारिज होने के बाद अब परिस्थितियां बदल गई हैं।

प्रवीण सिंह ऐरन, सपा गठबंधन
पूर्व सांसद प्रवीण सिंह ऐरन लोकसभा का पांचवां चुनाव लड़ रहे हैं। पिछले चार चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे थे और पहली बार सपा से मैदान में हैं। गठबंधन की वजह से मुस्लिमों की एकजुटता का भरोसा है। इससे पहले वर्ष 2009 में संतोष गंगवार को हरा चुके हैं। 
 

जातीय समीकरण
कुर्मी       -    05 लाख
मुस्लिम   -    05 लाख
एससी     -    1.50 लाख
मौर्य        -    1.50 लाख
लोधी       -    01 लाख
सिख       -    01 लाख
ब्राह्मण     -    01 लाख
कायस्थ   -    80 हजार
यादव     -    70 हजार
वैश्य      -    60 हजार
19,16,986 कुल मतदाता
नोट : आंकड़े अलग-अलग राजनीतिक दलों के दावों पर हैं। इनमें बदलाव संभव है। 

मुकाबला रोमांचक होने के आसार 
भाजपा पहली बार इस सीट पर इतना जोर लगा रही है। इससे साफ़ है कि यहां मुकाबला दिलचस्प और कांटे का है। अच्छी तादाद में मुस्लिम मतदाता होने के बावजूद वर्ष 1989 के बाद हुए अब तक नौ चुनावों में महज एक बार वर्ष 2009 में कांग्रेस जीत सकी थी। इस बार संतोष गंगवार का टिकट कटने के बाद भाजपा में मचे सियासी घमासान से विपक्ष की उम्मीदें जाग गईं। 

चुनावी मौसम के परवान चढ़ने के साथ ही भाजपा ने भितरघात रोकने के लिए पीएम मोदी के रोड शो और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, गृहमंत्री अमित शाह सहित अन्य मंत्रियों की जनसभाओं से हिंदू मतदाताओं को रिझाने की पुरजोर कोशिश की है। दूसरी तरफ सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी यहां रैलियों के जरिये माहौल बनाया है।

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