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Hardoi News: बेटे-बहू को समझाने की उम्र में टकरा रहे बुजुर्ग दंपती
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हरदोई। उनकी उम्र गोद में नाती और पोतों को खिलाने की है। बेटे और बहू को समन्वय के साथ जीवन गुजारने की सीख देने की है मगर जिंदगी के छह दशक बीत जाने के बाद अब अहम (ईगो) मुसीबत बना हुआ है।
कोई 30 साल से तो कोई 40 साल से साथ रहा लेकिन अब समस्या अहम की आ गई है। छोटी-छोटी बातों को लेकर शुरू हुई तकरार अब अलगाव तक पहुंच गई है। अलगाव भी आपसी नहीं बल्कि अदालत की डायस से। जिंदगी की ढलान पर ऐसी कड़वाहट घुल गई कि दंपती अब एक दिन तो छोड़िए एक घंटे भी साथ रहने को तैयार नहीं हैं। जनपद स्थित परिवार न्यायालय में दर्ज हो रहे मामले इस बात की गवाही देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है जहां दोनों पक्ष भावनात्मक रूप से टूटे हुए और मानसिक तनाव को झेलते हुए मिल रहे हैं।
केस–एक
शहर के एक मोहल्ला निवासी महिला की शादी मार्च 1988 में हुई थी। वर्ष 2005 तक यानी 17 साल तक दांपत्य जीवन सुखद रहा। इसके बाद घरेलू दिनचर्या और आपसी संवाद को लेकर आए दिन विवाद होने लगा। महिला ने परिवार न्यायालय में वर्ष 2010 में वाद दायर कर दिया। दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास भी विफल हो गया और अब मामला विचारण यानी ट्रायल पर है।
केस 2
एक गांव निवासी महिला की उम्र 75 साल है। उनके पति उम्र में उनसे दाे वर्ष छोटे यानी 73 साल के हैं। 52 साल पहले दोनों की शादी हुई थी। वर्ष 2010 तक दांपत्य जीवन सुखमय रहा। महिला का दावा है कि पति की नजदीकियां दूसरी महिला से हो गईं। इसको लेकर विवाद इतना बढ़ा कि मामला न्यायालय तक पहुंच गया। फिलहाल दोनों अलग रह रहे हैं।
केस-3
एक गांव निवासी बुजुर्ग महिला (66) ने पति (67) पर उपेक्षा करने का आरोप लगाया। परिवार न्यायालय में मामला पहुंचा तो वृद्धा और उनके पति को काउंसलिंग के लिए बुलाया गया। दोनों को समझाया गया कि इस उम्र में बहस नहीं बल्कि सम्मान और भावनात्मक सहयोग जरूरी है। दोनों पक्षों में फिलहाल बात तो नहीं बनी लेकिन दोनों ने ही विचार करने के लिए समय मांगा है।
जनपद के परिवार न्यायालय में तकरीबन छह हजार मामले विचाराधीन हैं। इनमें से चार हजार मामले तलाक और विदाई के हैं। दो हजार मामले गुजारा भत्ता के हैं। उक्त मामलों में लगभग 75 मामले ऐसे हैं जिनमें दंपती की उम्र 60 साल से अधिक है।
काउंसलर राहुल मिश्रा बताते हैं कि बुजुर्ग दंपती के बीच विवाद का प्रमुख कारण बढ़ती उम्र के साथ मानसिक और शारीरिक बदलाव है। उम्र की ढलान पर व्यक्ति अधिक संवेदनशील और चिड़चिड़ा हो जाता है। खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है। छोटे-छोटे घरेलू मुद्दे, संतान की उपेक्षा, आर्थिक निर्भरता और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आपसी तकरार का कारण बन जाती हैं। कई बुजुर्ग दंपती को लगता है कि जीवन भर की मेहनत के बाद भी उन्हें सम्मान और देखभाल नहीं मिल रही है।
काउंसलर अमित वाजपेयी ने कहा कि बुजुर्ग दंपती के बीच झगड़े का एक बड़ा कारण पारिवारिक विघटन और बदलती सामाजिक संरचना है। उन्होंने कहा कि पहले संयुक्त परिवार प्रणाली में बुजुर्गों को भावनात्मक सहारा मिलता था लेकिन वर्तमान में एकल परिवार और अलग-अलग रहन-सहन के कारण बुजुर्ग अकेलापन महसूस करते हैं। संवाद की कमी, शक, अविश्वास और भावनात्मक दूरी पैदा करता है जो धीरे-धीरे कानूनी विवाद का रूप ले लेता है।
काउंसलर नीतू सिंह ने कहा कि बुजुर्ग दंपती के विवाद के पीछे लंबे समय से दबे हुए मनोवैज्ञानिक और पारिवारिक तनाव भी जिम्मेदार होते हैं। कई दंपती जीवन भर सामाजिक दबाव, आर्थिक संघर्ष और बच्चों की जिम्मेदारियों के कारण अपने मतभेदों को दबाते रहते हैं लेकिन वृद्धावस्था में जब जिम्मेदारियां कम होती हैं तब पुराने गिले-शिकवे उभरकर सामने आते हैं।
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कोई 30 साल से तो कोई 40 साल से साथ रहा लेकिन अब समस्या अहम की आ गई है। छोटी-छोटी बातों को लेकर शुरू हुई तकरार अब अलगाव तक पहुंच गई है। अलगाव भी आपसी नहीं बल्कि अदालत की डायस से। जिंदगी की ढलान पर ऐसी कड़वाहट घुल गई कि दंपती अब एक दिन तो छोड़िए एक घंटे भी साथ रहने को तैयार नहीं हैं। जनपद स्थित परिवार न्यायालय में दर्ज हो रहे मामले इस बात की गवाही देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है जहां दोनों पक्ष भावनात्मक रूप से टूटे हुए और मानसिक तनाव को झेलते हुए मिल रहे हैं।
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केस–एक
शहर के एक मोहल्ला निवासी महिला की शादी मार्च 1988 में हुई थी। वर्ष 2005 तक यानी 17 साल तक दांपत्य जीवन सुखद रहा। इसके बाद घरेलू दिनचर्या और आपसी संवाद को लेकर आए दिन विवाद होने लगा। महिला ने परिवार न्यायालय में वर्ष 2010 में वाद दायर कर दिया। दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास भी विफल हो गया और अब मामला विचारण यानी ट्रायल पर है।
केस 2
एक गांव निवासी महिला की उम्र 75 साल है। उनके पति उम्र में उनसे दाे वर्ष छोटे यानी 73 साल के हैं। 52 साल पहले दोनों की शादी हुई थी। वर्ष 2010 तक दांपत्य जीवन सुखमय रहा। महिला का दावा है कि पति की नजदीकियां दूसरी महिला से हो गईं। इसको लेकर विवाद इतना बढ़ा कि मामला न्यायालय तक पहुंच गया। फिलहाल दोनों अलग रह रहे हैं।
केस-3
एक गांव निवासी बुजुर्ग महिला (66) ने पति (67) पर उपेक्षा करने का आरोप लगाया। परिवार न्यायालय में मामला पहुंचा तो वृद्धा और उनके पति को काउंसलिंग के लिए बुलाया गया। दोनों को समझाया गया कि इस उम्र में बहस नहीं बल्कि सम्मान और भावनात्मक सहयोग जरूरी है। दोनों पक्षों में फिलहाल बात तो नहीं बनी लेकिन दोनों ने ही विचार करने के लिए समय मांगा है।
जनपद के परिवार न्यायालय में तकरीबन छह हजार मामले विचाराधीन हैं। इनमें से चार हजार मामले तलाक और विदाई के हैं। दो हजार मामले गुजारा भत्ता के हैं। उक्त मामलों में लगभग 75 मामले ऐसे हैं जिनमें दंपती की उम्र 60 साल से अधिक है।
काउंसलर राहुल मिश्रा बताते हैं कि बुजुर्ग दंपती के बीच विवाद का प्रमुख कारण बढ़ती उम्र के साथ मानसिक और शारीरिक बदलाव है। उम्र की ढलान पर व्यक्ति अधिक संवेदनशील और चिड़चिड़ा हो जाता है। खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है। छोटे-छोटे घरेलू मुद्दे, संतान की उपेक्षा, आर्थिक निर्भरता और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आपसी तकरार का कारण बन जाती हैं। कई बुजुर्ग दंपती को लगता है कि जीवन भर की मेहनत के बाद भी उन्हें सम्मान और देखभाल नहीं मिल रही है।
काउंसलर अमित वाजपेयी ने कहा कि बुजुर्ग दंपती के बीच झगड़े का एक बड़ा कारण पारिवारिक विघटन और बदलती सामाजिक संरचना है। उन्होंने कहा कि पहले संयुक्त परिवार प्रणाली में बुजुर्गों को भावनात्मक सहारा मिलता था लेकिन वर्तमान में एकल परिवार और अलग-अलग रहन-सहन के कारण बुजुर्ग अकेलापन महसूस करते हैं। संवाद की कमी, शक, अविश्वास और भावनात्मक दूरी पैदा करता है जो धीरे-धीरे कानूनी विवाद का रूप ले लेता है।
काउंसलर नीतू सिंह ने कहा कि बुजुर्ग दंपती के विवाद के पीछे लंबे समय से दबे हुए मनोवैज्ञानिक और पारिवारिक तनाव भी जिम्मेदार होते हैं। कई दंपती जीवन भर सामाजिक दबाव, आर्थिक संघर्ष और बच्चों की जिम्मेदारियों के कारण अपने मतभेदों को दबाते रहते हैं लेकिन वृद्धावस्था में जब जिम्मेदारियां कम होती हैं तब पुराने गिले-शिकवे उभरकर सामने आते हैं।