{"_id":"6a442355dc3a019dce0fc473","slug":"antiquities-recovered-from-the-excavation-of-the-confirmed-later-vedic-period-capital-mound-maharajganj-news-c-206-1-mhg1034-180245-2026-07-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"Maharajganj News: उत्तर वैदिक काल के प्रमाणित हुए राजधानी टीले के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Maharajganj News: उत्तर वैदिक काल के प्रमाणित हुए राजधानी टीले के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
2004-05 में तीन माह तक हुआ था उत्खनन, कार्बन डेटिंग 14 की रिपोर्ट आने पर लगी मुहर
जून के पहले सप्ताह में बृजमनगंज के खड़खोड़ा टीला पर स्थापित शिवलिंग कुषाण काल के हुए थे सिद्ध
महराजगंज। जून के आखिरी सप्ताह में राजधानी टीले के उत्खनन वस्तुओं के कार्बन डेटिंग रिपोर्ट 14 में इनके उत्तर वैदिक काल के होने की पुष्टि हुई है। मंगलोर विश्वविद्यालय (सीएआरईआर) कर्नाटक की इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद क्षेत्र में पर्यटन के दिशा में विकास की संभावनाओं को बल मिला है।
जानकारी के अनुसार, क्षेत्रीय पुरातत्व विभाग ने 2004-2005 में राजधानी टीले का उत्खनन कराया था। उत्खनन से प्राप्त मृदभांड इत्यादि को कार्बन डेटिंग के लिए उक्त संस्थान को भेजा गया था। यह रिपोर्ट 24 जून 2026 को क्षेत्रीय कार्यालय गोरखपुर को प्राप्त हुई। रिपोर्ट के आधार पर उक्त टीले के संरक्षण का प्रस्ताव विभाग ने पुरातत्व निदेशालय को भेजा है।
अब पुरातत्व उपलब्धियों के जून 2026 जिले के लिए अविस्मरणीय साबित होता दिख रहा है। गौरतलब है कि जून महीने के पहले सप्ताह में बृजमनगंज के खड़खोड़ा टीला पर स्थापित शिवलिंग कुषाण काल के सिद्ध हुए और अब कोल्हुई बाजार के निकट ग्राम पंचायत राजधानी टीले के उत्खनन में मिली सामग्री उत्तर वैदिक काल की सिद्ध हुई है। कार्बन डेटिंग रिपोर्ट 14 के जरिये यह जानकारी पुख्ता हुई है।
विज्ञापन
2004-05 में हुआ था उत्खनन
प्रभारी क्षेत्रीय उत्खनन अधिकारी राम विनय की देखरेख में जनपद के राजधानी टीले का उत्खनन कार्य कराया गया था। उन्होंने बताया कि नवंबर 2005 से जनवरी 2006 तक टीले का उत्खनन कराया गया था। ग्राम पंचायत के दक्षिण स्थित लगभग 300 मीटर एक ऊंचा टीला है। पास ही एक प्राचीन शिवमंदिर है। उक्त टीले के प्राचीन होने की बात जनपद के पुलिस अधीक्षक रहे विजय कुमार ने दी थी। उनकी देखरेख में उत्खनन शुरू हुआ। खुदाई में यहां बुद्धकाल से लगभग 800 वर्ष पुरानी दो संस्कृतियों के साक्ष्य मिले। उत्खनन में छल्लेदार कुएं, सुनियोजित आवासीय संरचना, नाली के जरिये गंदा पानी निकालने की व्यवस्था के चिह्न मिले। दूसरी सभ्यता बुद्धकाल के 800 वर्ष पहले की मिली जो उत्तर वैदिक काल का संकेत दे रही थी क्योंकि यहां मिले सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि, वृक्ष व मेरु पर्वत, कृष्ण लेपित मिट्टी के बर्तन, हत्थेदार जग व नेग्मेष पूजा के चिह्न मिले थे। पुरा अवशेष जांच के लिए बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान लखनऊ भेजा गया था जहां से कुछ उत्खनन सामग्री कार्बन डेटिंग-14 के लिए मंगलोर विश्वविद्यालय (सीएआरईआर) कर्नाटक भेजी गई थी जिसकी रिपोर्ट में उक्त टीला उत्तर वैदिक काल का साबित हुआ। इसके संरक्षण के लिए अब प्रस्ताव निदेशालय भेजा गया है अनुमति मिलते ही स्थानीय प्रशासन से संपर्क किया जाएगा।
गोरखपुर-सोनौली राष्ट्रीय राजमार्ग पर कोल्हुई बाजार से पहले पश्चिम दिशा में लगभग छह किमी पक्की सड़क पर राजधानी ग्राम पंचायत है। इसकी दूरी महराजगंज जनपद मुख्यालय से लगभग 67 किमी है।
वर्जन
उत्तर वैदिक काल हड़प्पा व मोहनजोदड़ो के बाद विकसित हुई संस्कृति थी। इस काल के साक्ष्य महराजगंज में हुए राजधानी टीला उत्खनन के बाद कार्बन डेटिंग-14 से प्रमाणित हुई है। इस टीले को संरक्षित करने के लिए निदेशालय को प्रस्ताव भेजा गया है।
- कृष्ण मोहन दुबे, सहायक क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी, गोरखपुर
संतान के देवता थे नैग्मेष
जवाहर लाल नेहरू पीजी काॅलेज महराजगंज के प्राचार्य प्रो. अजय कुमार मिश्रा ने बताया नैग्मेष संतान के देवता माने जाते हैं। इनकी पूजा के साक्ष्य उत्तर वैदिक, बौद्ध और पूर्व-मध्य काल तक मिलते हैं। इनका सिर हिरण के आकार का था। बिहार के कुम्रहार में हुए उत्खनन में इनकी मूर्ति मिली थी। महराजगंज में अब तक सिर्फ बुद्धकाल के ही साक्ष्य मिले लेकिन राजधानी टीला उसके पहले का सिद्ध हुआ यह शोध कार्यों में सहायक होगा।
वर्जन
राजधानी टीले के उत्खनन में मिले पुरावशेष बौद्धकाल से पहले के सिद्ध होने की जानकारी जिले की बड़ी उपलब्धि है। पुरातत्व विभाग को संरक्षण के लिए सभी तरह का प्रशासनिक सहयोग दिया जाएगा।
-गौरव सिंह सोगरवाल, डीएम, महराजगंज
विज्ञापन
जून के पहले सप्ताह में बृजमनगंज के खड़खोड़ा टीला पर स्थापित शिवलिंग कुषाण काल के हुए थे सिद्ध
महराजगंज। जून के आखिरी सप्ताह में राजधानी टीले के उत्खनन वस्तुओं के कार्बन डेटिंग रिपोर्ट 14 में इनके उत्तर वैदिक काल के होने की पुष्टि हुई है। मंगलोर विश्वविद्यालय (सीएआरईआर) कर्नाटक की इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद क्षेत्र में पर्यटन के दिशा में विकास की संभावनाओं को बल मिला है।
जानकारी के अनुसार, क्षेत्रीय पुरातत्व विभाग ने 2004-2005 में राजधानी टीले का उत्खनन कराया था। उत्खनन से प्राप्त मृदभांड इत्यादि को कार्बन डेटिंग के लिए उक्त संस्थान को भेजा गया था। यह रिपोर्ट 24 जून 2026 को क्षेत्रीय कार्यालय गोरखपुर को प्राप्त हुई। रिपोर्ट के आधार पर उक्त टीले के संरक्षण का प्रस्ताव विभाग ने पुरातत्व निदेशालय को भेजा है।
विज्ञापन
अब पुरातत्व उपलब्धियों के जून 2026 जिले के लिए अविस्मरणीय साबित होता दिख रहा है। गौरतलब है कि जून महीने के पहले सप्ताह में बृजमनगंज के खड़खोड़ा टीला पर स्थापित शिवलिंग कुषाण काल के सिद्ध हुए और अब कोल्हुई बाजार के निकट ग्राम पंचायत राजधानी टीले के उत्खनन में मिली सामग्री उत्तर वैदिक काल की सिद्ध हुई है। कार्बन डेटिंग रिपोर्ट 14 के जरिये यह जानकारी पुख्ता हुई है।
विज्ञापन
2004-05 में हुआ था उत्खनन
प्रभारी क्षेत्रीय उत्खनन अधिकारी राम विनय की देखरेख में जनपद के राजधानी टीले का उत्खनन कार्य कराया गया था। उन्होंने बताया कि नवंबर 2005 से जनवरी 2006 तक टीले का उत्खनन कराया गया था। ग्राम पंचायत के दक्षिण स्थित लगभग 300 मीटर एक ऊंचा टीला है। पास ही एक प्राचीन शिवमंदिर है। उक्त टीले के प्राचीन होने की बात जनपद के पुलिस अधीक्षक रहे विजय कुमार ने दी थी। उनकी देखरेख में उत्खनन शुरू हुआ। खुदाई में यहां बुद्धकाल से लगभग 800 वर्ष पुरानी दो संस्कृतियों के साक्ष्य मिले। उत्खनन में छल्लेदार कुएं, सुनियोजित आवासीय संरचना, नाली के जरिये गंदा पानी निकालने की व्यवस्था के चिह्न मिले। दूसरी सभ्यता बुद्धकाल के 800 वर्ष पहले की मिली जो उत्तर वैदिक काल का संकेत दे रही थी क्योंकि यहां मिले सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि, वृक्ष व मेरु पर्वत, कृष्ण लेपित मिट्टी के बर्तन, हत्थेदार जग व नेग्मेष पूजा के चिह्न मिले थे। पुरा अवशेष जांच के लिए बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान लखनऊ भेजा गया था जहां से कुछ उत्खनन सामग्री कार्बन डेटिंग-14 के लिए मंगलोर विश्वविद्यालय (सीएआरईआर) कर्नाटक भेजी गई थी जिसकी रिपोर्ट में उक्त टीला उत्तर वैदिक काल का साबित हुआ। इसके संरक्षण के लिए अब प्रस्ताव निदेशालय भेजा गया है अनुमति मिलते ही स्थानीय प्रशासन से संपर्क किया जाएगा।
गोरखपुर-सोनौली राष्ट्रीय राजमार्ग पर कोल्हुई बाजार से पहले पश्चिम दिशा में लगभग छह किमी पक्की सड़क पर राजधानी ग्राम पंचायत है। इसकी दूरी महराजगंज जनपद मुख्यालय से लगभग 67 किमी है।
वर्जन
उत्तर वैदिक काल हड़प्पा व मोहनजोदड़ो के बाद विकसित हुई संस्कृति थी। इस काल के साक्ष्य महराजगंज में हुए राजधानी टीला उत्खनन के बाद कार्बन डेटिंग-14 से प्रमाणित हुई है। इस टीले को संरक्षित करने के लिए निदेशालय को प्रस्ताव भेजा गया है।
- कृष्ण मोहन दुबे, सहायक क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी, गोरखपुर
संतान के देवता थे नैग्मेष
जवाहर लाल नेहरू पीजी काॅलेज महराजगंज के प्राचार्य प्रो. अजय कुमार मिश्रा ने बताया नैग्मेष संतान के देवता माने जाते हैं। इनकी पूजा के साक्ष्य उत्तर वैदिक, बौद्ध और पूर्व-मध्य काल तक मिलते हैं। इनका सिर हिरण के आकार का था। बिहार के कुम्रहार में हुए उत्खनन में इनकी मूर्ति मिली थी। महराजगंज में अब तक सिर्फ बुद्धकाल के ही साक्ष्य मिले लेकिन राजधानी टीला उसके पहले का सिद्ध हुआ यह शोध कार्यों में सहायक होगा।
वर्जन
राजधानी टीले के उत्खनन में मिले पुरावशेष बौद्धकाल से पहले के सिद्ध होने की जानकारी जिले की बड़ी उपलब्धि है। पुरातत्व विभाग को संरक्षण के लिए सभी तरह का प्रशासनिक सहयोग दिया जाएगा।
-गौरव सिंह सोगरवाल, डीएम, महराजगंज