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Maharajganj News: धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस मनाते हुए देवदह के प्राचीन बौद्ध स्तूप की परिक्रमा की
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लक्ष्मीपुर। भगवान बुद्ध के ननिहाल के रूप में प्रसिद्ध स्थल देवदह (बनरसिहा कला) में बुधवार को आषाढ़ी पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा एवं धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस) कार्यक्रम का आयोजन हुआ। देवदह रामग्राम बौद्ध विकास समिति द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में दूर-दराज से पहुंचे बौद्ध भिक्षुओं एवं श्रद्धालुओं ने प्राचीन बौद्ध स्तूप की परिक्रमा कर पूजा-वंदना की तथा बुद्ध के उपदेशों का स्मरण किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ बौद्ध भिक्षुओं एवं उपासकों द्वारा प्राचीन बौद्ध टीले की परिक्रमा से हुआ। इसके पश्चात त्रिशरण एवं पंचशील ग्रहण कर सामूहिक बुद्ध वंदना की गई। पूरे वातावरण में बौद्ध मंत्रों की गूंज और श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया। मुख्य वक्ता बौद्ध भिक्षु भंते धम्मपाल ने कहा कि आषाढ़ी पूर्णिमा का बौद्ध धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
इसी दिन राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने 29 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन का त्याग कर महाभिनिष्क्रमण किया था। उन्होंने बताया कि सम्यक संबोधि प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने सारनाथ में पंचवर्गीय भिक्षुओं को अपना प्रथम उपदेश देकर धम्मचक्र प्रवर्तन की शुरुआत की थी। इसलिए इस दिन को धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि आषाढ़ी पूर्णिमा पर बौद्ध धर्मावलंबी पूजा-अर्चना के साथ भिक्षुओं को दान देकर पुण्य अर्जित करते हैं।
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भंते उत्तमानन्द ने कहा कि बौद्ध परंपरा के अनुसार आषाढ़ी पूर्णिमा बौद्ध अनुयायियों के लिए विशेष श्रद्धा और प्रेरणा का प्रतीक माना जाता है। समिति के अध्यक्ष जितेंद्र राव ने बताया कि हर बार की तरह इस साल भी 14 अक्टूबर को बनरसिहा कला स्थित देवदह में एक विशाल अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन आयोजित होगा। सम्मेलन में देश-विदेश से बौद्ध भिक्षुओं, विद्वानों एवं श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है। इसकी तैयारियां प्रारंभ कर दी गई हैं। इस अवसर पर भंते महिपाल, महानाम, कौटिल्य, जयराम कोली, रामललित गौतम, बीपी भारती, अनिल गौतम, नंदलाल गौतम, रोहित गौतम, सुग्रीव कुमार, मंगल प्रसाद, संतराम डॉ. प्रभु, हरिश्चंद्र चौधरी, रामबचन आदि की मौजूदगी रही।
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कार्यक्रम का शुभारंभ बौद्ध भिक्षुओं एवं उपासकों द्वारा प्राचीन बौद्ध टीले की परिक्रमा से हुआ। इसके पश्चात त्रिशरण एवं पंचशील ग्रहण कर सामूहिक बुद्ध वंदना की गई। पूरे वातावरण में बौद्ध मंत्रों की गूंज और श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया। मुख्य वक्ता बौद्ध भिक्षु भंते धम्मपाल ने कहा कि आषाढ़ी पूर्णिमा का बौद्ध धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
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इसी दिन राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने 29 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन का त्याग कर महाभिनिष्क्रमण किया था। उन्होंने बताया कि सम्यक संबोधि प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने सारनाथ में पंचवर्गीय भिक्षुओं को अपना प्रथम उपदेश देकर धम्मचक्र प्रवर्तन की शुरुआत की थी। इसलिए इस दिन को धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि आषाढ़ी पूर्णिमा पर बौद्ध धर्मावलंबी पूजा-अर्चना के साथ भिक्षुओं को दान देकर पुण्य अर्जित करते हैं।
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भंते उत्तमानन्द ने कहा कि बौद्ध परंपरा के अनुसार आषाढ़ी पूर्णिमा बौद्ध अनुयायियों के लिए विशेष श्रद्धा और प्रेरणा का प्रतीक माना जाता है। समिति के अध्यक्ष जितेंद्र राव ने बताया कि हर बार की तरह इस साल भी 14 अक्टूबर को बनरसिहा कला स्थित देवदह में एक विशाल अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन आयोजित होगा। सम्मेलन में देश-विदेश से बौद्ध भिक्षुओं, विद्वानों एवं श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है। इसकी तैयारियां प्रारंभ कर दी गई हैं। इस अवसर पर भंते महिपाल, महानाम, कौटिल्य, जयराम कोली, रामललित गौतम, बीपी भारती, अनिल गौतम, नंदलाल गौतम, रोहित गौतम, सुग्रीव कुमार, मंगल प्रसाद, संतराम डॉ. प्रभु, हरिश्चंद्र चौधरी, रामबचन आदि की मौजूदगी रही।