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Meerut: आवारा कुत्तों को आतंक, एक करोड़ खर्च, नसबंदी बनी सिर्फ दिखावा, नगर निगम की नाकामी उजागर

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: डिंपल सिरोही Updated Thu, 15 Jan 2026 11:46 AM IST
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सार

मेरठ में आवारा कुत्तों की समस्या बेकाबू हो चुकी है। एक करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद नसबंदी योजना नाकाम साबित हो रही है। रोजाना हमले और अस्पतालों में रेबीज इंजेक्शन की लंबी कतारें हालात की गंभीरता बता रही हैं।

Meerut: Rs one Crore Spent, Dog Sterilization Turns Into Eyewash, Alarm Bells for the City
सड़क पर घूमते आवारा कुत्ते
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विस्तार
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मेरठ शहर में आवारा कुत्तों का आतंक किसी से छिपा नहीं है। गलियों, मोहल्लों और कॉलोनियों में घूमते बेसहारा कुत्ते रोजाना लोगों को काट रहे हैं। बच्चों, बुजुर्गों और राहगीरों पर हमले आम हो चुके हैं। जिला अस्पताल में रेबीज इंजेक्शन के लिए लंबी कतारें इस बात की गवाही दे रही हैं कि हालात कितने भयावह हो चुके हैं। सवाल यह है कि जब शासन हर साल करीब एक करोड़ रुपये नगर निगम को आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए दे रहा है फिर भी शहर की जनता आज भी दहशत में जी रही है।

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नगर निगम मेरठ की ओर से परतापुर थाना क्षेत्र के शंकर नगर फेस-2 में एनीमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) सेंटर बनाया गया था। उद्देश्य था कुत्तों की नसबंदी कर उनकी संख्या पर नियंत्रण लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। बुधवार को अमर उजाला टीम के निरीक्षण में यह साफ हो गया कि यह सेंटर सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है। सेंटर में प्रवेश तक के लिए कर्मचारियों से जद्दोजहद करनी पड़ी। अंदर हालात और भी चिंताजनक थे।
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कार्यालय के कमरे में बने चार पिंजरों में केवल दो कुत्ते बंद मिले। दूसरे कमरे में 15 से 20 कुत्ते थे, जबकि परिसर में लगी लोहे की जाली में 50 से 60 कुत्ते ठूंसे गए थे। कर्मचारियों का दावा है कि प्रतिदिन 28 से 32 कुत्ते पकड़कर लाए जाते हैं और माह में करीब 900 कुत्तों की नसबंदी की जाती है। अगर यह दावा सही है तो फिर सवाल उठता है कि शहर में कुत्तों की संख्या लगातार क्यों बढ़ रही है।

 

सरकार ने एक कुत्ते को पकड़ने, रेबीज इंजेक्शन, नसबंदी और पोषक आहार के लिए 998 रुपये का बजट तय किया है। इस हिसाब से एबीसी सेंटर पर सालाना लगभग एक करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके बावजूद नगर निगम के पास केवल 150 कुत्तों को रखने की क्षमता है, जबकि शहर में हजारों आवारा कुत्ते खुलेआम घूम रहे हैं। यह सीधा-सीधा बजट के दुरुपयोग और प्रशासनिक उदासीनता का मामला बनता है।

 

नगर निगम ने सेंटर के संचालन की जिम्मेदारी निजी संस्था ‘श्याम हेल्पिंग इनसाइट’ को दी है। संस्था के इंचार्ज केशव कुमार के अनुसार यहां दो चिकित्सक, दो गाड़ियां, तीन कर्मचारी और चार केचर तैनात हैं। इतने सीमित संसाधनों के सहारे पूरे महानगर की समस्या सुलझाने का दावा करना अपने आप में मजाक है।
 

न्यायालय भी गंभीर
न्यायालय भी लगातार बढ़ती घटनाओं को लेकर गंभीर है, लेकिन नगर निगम की कार्यप्रणाली में कोई ठोस सुधार नजर नहीं आ रहा। एक करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी अगर शहर सुरक्षित नहीं है, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। कब तक मेरठ की जनता नगर निगम की लापरवाही की कीमत अपनी जान और सुरक्षा से चुकाती रहेगी

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