पुण्यतिथि: रणसिंघा बजते ही उमड़ पड़ते किसान, सिसौली के 'बाबा' ने दिखाई गांव की ताकत
सिसौली के बाबा महेंद्र सिंह टिकैत ने किसान आंदोलन को नई पहचान दी। उनके एक आह्वान पर हजारों किसान खेतों से निकलकर सड़कों पर उतर आते थे। उनकी सादगी, अनुशासन और संघर्ष की विरासत आज भी किसानों को प्रेरित करती है।
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कभी पश्चिम उत्तर प्रदेश के गांवों में अगर रणसिंघा बज जाता था तो लोग समझ जाते थे कि बाबा महेंद्र सिंह टिकैत ने बुलावा दे दिया है। फिर खेतों से किसान निकल पड़ते थे। कोई ट्रैक्टर लेकर, कोई बैलगाड़ी से, कोई पैदल। घर की औरतें गठरी में रोटियां बांध देती थीं और किसान दिल्ली, मेरठ या लखनऊ की तरफ चल पड़ते थे।
उन्हें पता होता था कि रास्ता लंबा है, रातें ठंडी होंगी, लेकिन एक भरोसा था कि सिसौली का बाबा उनके हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। सत्ता को यह अहसास हो गया था कि खेत में हल चलाने वाला आदमी अगर सड़क पर उतर आया, तो राजपथ भी छोटा पड़ सकता है।
मेरठ कमिश्नरी पर डटे थे लाखों किसान
1988 का वह दृश्य आज भी भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े जन आंदोलनों में गिना जाना चाहिए। मेरठ कमिश्नरी पर लाखों किसान डटे थे। खुले आसमान के नीचे धरना चल रहा था। दिसंबर और जनवरी की सर्द रातें थीं। खेतों से आए किसान ट्रैक्टर ट्रॉलियों में सो रहे थे।
कहीं चूल्हा जल रहा था, कहीं कोई हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। हजारों किसानों के बीच उनका नेता भी किसी मंच पर नहीं, बल्कि उन्हीं के बीच बैठा मिलता था। वही धूल भरा धोती कुर्ता, सिर पर टोपी और चेहरे पर अजीब सा आत्मविश्वास।
धरनास्थल पर कहीं हवन और कहीं नमाज
उस दौर को देखने वाले लोग बताते हैं कि आंदोलन स्थल पर कोई भूखा नहीं सोता था। गांवों से दूध आता था, रोटियां आती थीं, गुड़ आता था। यह केवल आंदोलन नहीं था, गांवों का सामूहिक परिवार था। मेरठ आंदोलन की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि 1987 के दंगों से टूट चुके समाज को जोड़ने का काम किया।
धरनास्थल पर नमाज भी हुई और हवन भी। उस समय किसान पहचान, धर्म से बड़ी हो गई थी। फिर आया 31 अक्तूबर 1988 और दिल्ली का वोट क्लब। भारतीय किसान आंदोलन का शायद सबसे बड़ा दिन।
दिल्ली ने पहली बार गांव की ताकत को इतने करीब से देखा था। इंडिया गेट, विजय चौक और वोट क्लब किसान समुद्र में बदल गए थे। हालत ऐसे बने कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को अपनी प्रस्तावित रैली का स्थान बदलना पड़ा। यह केवल राजनीतिक घटना नहीं थी।
यह उस किसान की दस्तक थी, जिसे लंबे समय तक केवल वोट देने वाली भीड़ समझा गया था। महेंद्र सिंह टिकैत ने गांव के आदमी को यह एहसास कराया कि वह किसी नेता या दल का मोहताज नहीं है। वह खुद अपनी लड़ाई लड़ सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि टिकैत में कोई पारंपरिक राजनीतिक गुण नहीं थे। वह महाभारत के उदाहरण देते थे, गांव की भाषा बोलते थे और किसानों से कहते थे कि सच्चाई की लड़ाई कभी हारती नहीं। शायद यही सादगी किसानों के दिल में उतर जाती थी।
उनके आंदोलनों में गुस्सा था, लेकिन हिंसा नहीं थी। लाखों किसानों की भीड़ के बावजूद न आगजनी, न तोड़फोड़। यह आज के दौर में लगभग असंभव सा लगता है। टिकैत जानते थे कि किसान की असली ताकत अनुशासन और नैतिक दबाव है।
संघर्ष की मजबूत साथी रहीं पत्नी
उनकी पत्नी बलजोरी देवी भी इस संघर्ष की मजबूत साथी थीं। जब बाबा आंदोलन या जेल में होते थे तो वह घर और संगठन दोनों संभालती थीं। लखनऊ आंदोलन में पुलिस लाठीचार्ज के दौरान घायल होने के बाद भी वह पीछे नहीं हटीं। यह केवल एक नेता की कहानी नहीं थी, बल्कि पूरे किसान परिवार के संघर्ष की कहानी थी।
आज गांव बदल गए हैं। चौपालें सिमट गई हैं। हुक्के की जगह मोबाइल ने ले ली है। आंदोलन अब कैमरों और सोशल मीडिया के दौर में पहुंच गए हैं। खेती पर संकट के दौर में किसान आत्मविश्वास खोता दिखाई देता है, तब बाबा टिकैत की याद और ज्यादा आती है। वो इसलिए कि उन्होंने किसान को डरना छोड़ लड़ना सिखाया था।
उनकी सबसे बड़ी विरासत यही है कि उन्होंने गांव के आदमी को सिर उठाकर खड़ा होना सिखाया। महेंद्र सिंह टिकैत चले गए, लेकिन खेतों की मेड़ों पर आज भी उनकी आवाज गूंजती है। जब भी कोई किसान अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है, कहीं न कहीं सिसौली का वह बाबा उसके भीतर जिंदा दिखाई देता है।